ADJOURNMENT MOTION ON BLACK MONEY

Lok Sabha Debates
ADJOURNMENT MOTION: Regarding Situation Arising Out Of Money ... on 14 December, 2011

Title: Regarding situation arising out of money deposited illegally in foreign banks and action being taken against the guilty persons.

श्री लाल कृष्ण आडवाणी (गांधीनगर):महोदया, मैं प्रस्ताव करता हूँ :

"कि सभा अब स्थगित हो। "

पिछले दो सालों में मंहगाई की चर्चा अनेक बार हुई है। पिछले दो सालों में भ्रष्टाचार और अलग-अलग घोटालों के बारे में कई बार चर्चा हुई है। लेकिन मुझे स्मरण नहीं आता कि आज तक संसद में कभी काले धन की चर्चा हुई हो। सन् 1947 में देश आजाद हुआ फिर संविधान बना, उसके बाद सन् 1952 से लेकर अनेक चुनाव हुए और संसद चलती रही। मैं शुरूआत में तो पत्रकार के नाते संसद की कार्यवाही से परिचित रहा बाद में सन् 1970 के बाद से सांसद बन कर परिचित रहा। कभी भी आर्थिक विषयों की चर्चा आती थी तो इसका उल्लेख होता था कि कितना धन अंडरग्राउंड है? जिसके बारे में पूरे अकाउंट्स सामने नहीं आते हैं और जिस पर टैक्स नहीं दिया जाता है, उसे काल धन कह कर पुकारते थे कि काला धन कितना है, उसका रेश्यो कितना है, कुल मिला कर जीडीपी का कितना भाग है। हम सब लोग जानते और मानते भी थे कि बहुत सारे काले धन की निर्मिति का कारण बहुत ऊंचा टैक्सेशन रेट था। 97.5 प्रतिशत इनकम टैक्स, वैल्थ टैक्स, गिफ्ट टैक्स आदि। दुनिया के बहुत कम देशों में इस प्रकार का ऊंचा टैक्स था। ऊंचा टैक्स होने के कारण काले धन का निर्माण होता है। इसकी चर्चा बहुत थोड़ी होती थी कि लोग विदेश जा कर काले धन को रखते हैं। चर्चा होती थी लेकिन प्रमुख रूप से यह मान लिया जाता था कि टैक्स इवेज़न होता है और टैक्स इवेड करने वालों को इसमें सुविधा होती है कि वे विदेशों में जा कर अपना धन रख लें इसीलिए अनऑथराइज्ड फॉरन बैंक अकाउंट्स खुलते थे। यह स्थिति तब बदली, जब टैक्स कम हो गया और खासकर अर्ली 1990 से लेकर के जिस प्रकार से हमने पुराना जो सारा एप्रोच आर्थिक क्षेत्र में था, उसे एक प्रकार से त्याग दिया। आज जो प्रधानमंत्री हैं, उनको इस बात का क्रेडिट दिया जाता है कि उनके वित्त मंत्री बनने के बाद लाइसेंस परमिट कोटा राज समाप्त हुआ और एक प्रकार से लिबरल इकॉनामी आ गयी, लिब्रलाइजेशन हो गया, विश्व में भी ग्लोबलाइजेशन होने लगा था। मैं मानता हूं कि उसके लिए उस समय का जो संकट पैदा हुआ था, वह उत्तरदायी था और अगर किसी व्यक्ति को श्रेय देना है, तो उस समय के प्रधानमंत्री नरसिंहराव जी को ज्यादा देना होगा। आज के प्रधानमंत्री जी उस समय वित्त मंत्री थे ही, लेकिन उसके बाद से यह देखकर आश्चर्य होता है कि उसके बाद जो ब्लैक मनी की निर्मिति हुयी है और ब्लैक मनी विदेशी बैंकों में गया है, वह पहले से कहीं ज्यादा है, बहुत ज्यादा है। मैं ज्यादा आंकड़े कोट नहीं करूंगा, आगे चलकर कहीं बताना होगा, तो मैं बता दूंगा। इस समय मैं बताना चाहता हूं कि इस काले धन के मामले को पिछले दिनों जब हमारे मित्र श्री रामजेठमलानी जी ने एक पिटीशन के द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल फाइल करके उठाया, तो उनकी पिटीशन में केवल एक नाम था। वह पुणे के एक सज्जन थे हसन अली, उनका नाम उसमें था। उसके बारे में विस्तार से उस पिटीशन में उल्लेख भी था। लेकिन एक बार जब उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट को कुछ जानकारी दी गयी और साथ-साथ Liechtenstein की एक बैंक के सोलह नाम दिए गए, तब जस्टिस रेड्डी ने सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम जी से पूछा कि “Why the Government is not disclosing names of others who have stashed away money in foreign banks? Is it that the black money issue is surrounding only one person? We put it very simply and bluntly, “Do you have any information regarding other persons also?” It seems there is only one person, Indian who has bank accounts in Switzerland and no other person’s account has come under suspicion in Swiss banks.” और इतना ही नहीं, उन्होंने आगे जाकर कहा कि “This is theft of national money.” और थेफ्ट ही नहीं, फिर उनको संतोष नहीं हुआ, तो उन्होंने कहा “I regard it as plunder.” लूट, लूट मानता हूं और इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने बाद में एक बार जब LGT Bank of Liechtenstein के बारे में एक लंबा जजमेंट दिया, तो उसमें तो उन्होंने इतनी बातें कहीं कि मुझे पढ़कर लगा कि सुप्रीम कोर्ट की नजर में इस ब्लैक मनी का कितना महत्व है? केवल इसका उल्लेख करने के लिए मैं थोड़ा सा कोटेशन उस जजमेंट में से सुनाऊंगा। मैं उस निर्णय में से बताऊंगा कि जब उनको ये सोलह नाम एलजीटी बैंक के मिले। सुप्रीम कोर्ट का कमैन्ट है : “The issue of unaccounted monies held by nationals, and other legal entities, in foreign banks, is of primordial importance to the welfare of the citizens. The quantum of such monies may be rough indicators of the weakness of the State, in terms of both crime prevention, and also of tax collection. Depending on the volume of such monies, and the number of incidents through which such monies are generated and secreted away, it may very well reveal the degree of softness of the State.”

The Supreme Court has recalled the concept of the soft State which was famously articulated by the Nobel Laureate, Gunnar Myrdal:

“It is a broad based assessment of the degree to which the State and its machinery is equipped to deal with its responsibilities of governance. The more soft the State is, greater the likelihood that there is an unholy nexus between the law maker ‘we’, the law keeper ‘you’ and the law breaker. If the State if soft, to a large extent, specially in terms of the unholy nexus between the law makers, the law keepers and the laws breakers, the moral authority and also the moral incentives to exercise suitable control over the economy and the society would vanish. Large unaccounted monies are generally an indication of that.”

Then it goes on to comment that “the issue is not merely whether the Union of India is making the necessary effort to bring back all or some significant part of the alleged monies. The fact that there is some information and knowledge that such vast amounts may have been stashed away in foreign banks implies that the State has the primordial responsibility under the Constitution to make every effort to trace the sources of such monies, punish the guilty, where such monies have been generated and taken abroad through unlawful activities and bring back the monies owed to the country.”

वित्त मंत्री ने यह सब पढ़ा होगा, लेकिन मुझे लगा कि सदन इस बात को पहचाने कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार जितनी मात्रा में फॉरैन बैंक अकाउंट्स ओपन हुए हैं और हम उन्हें वापस नहीं ला पाए हैं, और इस प्रकार से फॉरैन अकाउंट्स खोलने वाले लोगों को दंडित नहीं कर पाए हैं, उतनी मात्रा में सुप्रीम कोर्ट की नज़रों में हम एक सॉफ्ट स्टेट बन गए हैं जो अपने कर्तव्यों का ठीक प्रकार से निर्वाह नहीं कर रहा है। यह हमारे कहने की बात नहीं है लेकिन वित्त मंत्री जी से मैं उम्मीद करता हूँ कि इन दोनों पहलुओं के बारे में बताएँगे, जिनका उल्लेख मेरे एडजर्नमैंट मोशन में भी है। एक - money deposited illegally in foreign banks, which should legitimately come back to India. और दूसरा पार्ट है - action being taken against the guilty persons. यह दूसरा हिस्सा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई हुई या नहीं। हुई तो क्या हुई? अगर बिना अनुमति के, बिना लैजिटिमेसी के कोई फॉरैन बैंक अकाउंट खोलता है तो वह भी अपराध है, किसी न किसी कानून में अपराध है। मेरे यहाँ दो-दो पूर्व वित्त मंत्री बैठे हैं और वे लगातार इसकी जानकारी हमें देते रहते हैं। मुझे इस बात की खुशी है, कभी-कभी लोग पूछते हैं कि आप भी तो कभी सरकार में थे। हमारे ये दोनों वित्त मंत्री उस समय थे। लोग पूछते हैं कि आपने क्यों नहीं उस समय काला धन वापस लाने के लिए कदम उठाए तथा जिनके गलत ढंग से विदेशों में अकाउंट खोले हुए थे, उनको वापस क्यों नहीं लाए, ऐसा पूछ रहे थे। यह स्थिति पहले नहीं थी कि जिसमें ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go in record.

श्री लाल कृष्ण आडवाणी :महोदया, आप जवाब देंगी तो दीजिए...( व्यवधान) लेकिन मैं अभी जवाब देना चाहता हूं। मैं जवाब देना चाहता हूं कि यह जो स्थिति में परिवर्तन आया है और वह एक मौलिक परिवर्तन आया है। वह यू.एन. सिक्योरिटी काउंसिल के कनवेन्शन ऑफ करप्शन के बाद आया है। उससे पहले नहीं था। मेरे पास यूनाइटेड नेशन्स कनवेंशन अगेंस्ट करप्शन के दो वॉल्यूम्स हैं। पहले में टैक्स्ट है और आप सोचिए कि इसको इन्होंने किस आफिस के जिम्मे किया। सिक्योरिटी काउंसिल का जो ऑफिस न्यूयार्क में है, उसको नहीं। It has been entrusted to the United Nations Office on Drugs and Crime. मानकर के चलें कि यह जो ब्लैकमनी जनरेट होती है, वह किसी समय होती होगी, हम जानते हैं टैक्स इवेज़न के कारण। लेकिन इस समय ड्रग्स एण्ड क्राइम्स के कारण ज्यादा होती है। इसीलिए वहां ब्लैक मनी का प्रयोग कम होता है, डर्टी मनी ज्यादा कहते हैं। हम लोग ब्लैक मनी कहते हैं, क्योंकि हम टैक्स इवेज़न से ही संबंधित रहते हैं। मैं मानता हूं कि अमेरिका खासकर 9/11 के बाद इसके बारे में बहुत चिंतित हुआ है। इतना बड़ा काण्ड वहां हुआ था। वैसा ही काण्ड यहां 13 दिसम्बर को उसी साल, यह वर्ष 2001 की बात है, जब यह भयंकर घटना न्यूयार्क में हुई और उसके अंतिम महीने में यहां हुई। यह जो टैर्रिस्ट इन्सीडेन्स हुए और धीरे-धीरे सब देशों को यह भी पता लगने लगा कि टैर्रिस्ट मनी का जो सौर्स है, वह डर्टी मनी है। जिसे लोग विदेशों में जमा करवाते हैं। मेरे पास नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र का एक कोटेश्न है। जब वे एक बार म्यूनिख में गए और म्यूनिख की एक काफ्रेंस में फाइनैंस एण्ड सिक्योरिटी एक इश्यू था। उसमें उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि जितने भी फोरन बैंक एकाउंट्स खुलते हैं, उनमें से बहुत-सा पैसा टैर्रिज्म के लिए जाता है। यह चिंता की बात है। This is what our former National Security Advisor, Shri Narayanan, mentioned in Munich at a Conference on finance and terror. उस पर बोलते हुए। उसके बाद जो स्थिति बदली, उसमें अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप के जितने पावरफुल देश थे, उन्होंने यूएन सिक्योरिटी काउंसिल पर प्रैशर बनाया। यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने वर्ष 2003 में पहली बार यूनाइटेड नेशन्स अंगैस्ट करप्शन पास किया। उसमें श्री कोफी अन्नान, सैक्रटरी जनरल ने फारवर्ड लिखा है। उन्होंने कहा है-

“Corruption is an insidious plague that has a wide range of corrosive effects on societies. It undermines democracy and the rule of law, leads to violations of human rights, distorts markets, erodes the quality of life and allows organized crime, terrorism and threats to human security to flourish.”



लेकिन उन्होंने दूसरी बात बहुत महत्वपूर्ण कही है-

“This evil phenomenon is found in all countries, big and small, rich and poor. But, it is in the developing world that its effects are most destructive. Corruption hurts the poor disproportionately by diverting funds intended for development, undermining a Government’s ability to provide basic services, feeding inequality and discouraging foreign aid and investment. Corruption is a key element in economic under-performance and a major obstacle to poverty alleviation and development.”



This is very relevant to us, to India. कि हम डेवलपमेंट भी नहीं कर सकेंगे। हम प्रोग्रेस भी नहीं कर सकेंगे। इसीलिए करप्शन के खिलाफ एक अभियान चलना चाहिए।

The black money kept in foreign accounts illegally, that is part of it. Again and again, they have spoken about it. मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अभी-अभी अपनी जन चेतना यात्रा के दौरान देश भर का भ्रमण करके आया हूं। लोग मज़ाक करते हैं। पर, मुझे इसका गर्व है। अभी थोड़े दिन पहले हिन्दुस्तान टाइम्स का एक लीडरशिप सम्मिट हुआ था, जिसमें सब पार्टियों के लोग गए थे। पहले दिन उसे प्रारम्भ करने के लिए प्रणब जी गए थे। उन्होंने मुझे भी आमंत्रित किया था। मैं पहले भी गया हूं, लेकिन इस बार के निमंत्रण में मैंने देखा कि जिस चीज़ की बहुत सारे लोग, मेरे अपने मित्र भी बहुत बार मेरा मज़ाक उड़ाते हैं कि आप क्यों यात्राएं करते हो, ख्वामख्वाह इतना कष्ट उठाते हो? I found it a compliment that the Hindustan Times invited me to make a Keynote Address to the Leadership Summit .Do you know on what topic? It was on “India’s Yatra into the future”. This is what they gave me as the topic. They need not have put the word ‘yatra’. I said it there also that I really take it as a compliment to the ‘perennial yatri’. मुझे खुशी हुई। जैसा मैंने आपको बताया कि मैंने देखा कि भ्रष्टाचार के बारे में लोग पढ़ते रहते हैं, सुनते रहते हैं, टेलीविज़न पर सुनते हैं। महंगाई का तो लोग लगातार अनुभव ही करते हैं, रोज़ अनुभव करते हैं। सुषमा जी ने उस दिन बड़े प्रभावी रूप से इस विषय पर बोला था। उन्होंने कहा था कि इसमें स्टैटिस्टिक्स का महत्व नहीं है, महत्व है कि एक गृहिणी को अपने किचेन में क्या अनुभव होता है। उसका जिस प्रकार से उन्होंने वर्णन किया, मैं आशा करता था कि कम से कम उस दिन प्रणब जी उसका उत्तर देंगे, वे फिर से आंकड़ें नहीं सुनाएंगे। लेकिन उस दिन मुझे खुशी नहीं हुई। खैर, कोई बात नहीं।

मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह कि इस बार मैंने देखा कि लोग महंगाई से लोग परिचित हैं, भ्रष्टाचार को जानते हैं। घोटाले तो बहुत पहले से चल रहे हैं। पहली बार जब मैंने घोटाला शब्द सुना था तो एक जीप स्कैण्डल की बात सुनी थी। वह बहुत वर्ष पहले की बात है। अब तो फिर उसके बाद बोफोर्स तक पहुंच गए। ...( व्यवधान) लेकिन जैसा मैंने कहा कि काले धन की चर्चा किसी ने सुनी नहीं। इसलिए आज मुझसे कई लोग बार-बार पूछते हैं कि क्या आज काले धन पर चर्चा होगी? मैंने कहा कि होगी।

अध्यक्ष महोदया, मैं आपका आभारी हूं कि आपने उसको एडजर्नमेंट मोशन के रूप में स्वीकार किया। चाहे जो उसके शब्द बदले गए हैं, वह साधारण एडजर्नमेंट मोशन के शब्द नहीं होते। मैंने कहा कोई बात नहीं, बस विषय की चर्चा हो जाए। जिस रूप में अध्यक्ष जी स्वीकार करें, मैं उसको मान लूंगा। Adjournment Motion is a failure of Government. आप हमारे कौल एण्ड शकधर की पुस्तक को उठाकर देखेंगे तो It speaks of failure of Government. Therefore, the fact that you have accepted it only testifies my view that Adjournment Motion would be the most appropriate. It is a failure of Government. पैसा वहां से नहीं आए। बाकी कई देशों ने ले लिए जो कि पहले नहीं ले सकते थे। पहले स्विट्जरलैण्ड के लोग हमेशा कहते थे कि बैंकिंग सिक्रेसी के हमारे नियम हैं, आप कौन होते हैं उन्हें वॉयलेट करने वाले? हम नहीं बताएंगे। हमारे यहां पर नियम है, हम तो मानते ही नहीं कि टैक्स इवेज़न कोई क्राइम है। क्राइम की बात होती तो बात अलग है। तब तो वे क्राइम की बात नहीं मानते थे, अब वे मानते हैं। अब उन्होंने स्विटजरलैंड में ही कंवेशन होने के बाद और ग्लोबल दबाव आने के बाद, they have passed a law which is titled as “Restitution of Illegal Assets Act, 2011”. रेस्टीटय़ूशन का मतलब है, हम वह सारा का सारा पैसा, जो गलत तरीके से कमाया गया है और हमारे यहां आ करके बैंकों में जमा हुआ है, उसे हम वापस करने को तैयार हैं। पहले स्थिति यह थी, आप बताएं कि वास्तव में गलत ढंग से हुआ है या नहीं, प्रमाण दें। अब कहते हैं कि प्रमाण नहीं भी देंगे तो भी हम इंक्वायरी करेंगे। हमें लगेगा कि गलत ढंग से है तो हम उसको आपके देश को वापस कर देंगे, चाहे उस व्यक्ति को वापस न करें, जैसे आपके यहां पर वह डेवलपमेंट के काम में लग जाए।

मुझे याद है, मैं जब अपनी सारी सभाओं में इस बात का उल्लेख करता था, मैं कहता था कि जो अनुमान लगाया गया है कि कितना धन विदेशों में भारतीयों का रखा है। वह बहुत बड़ा अमाउंट है, छोटा-मोटा अमाउंट नहीं है। यहां पर इन दिनों में, पिछले विंटर सैशन में इस बात पर बड़ी बहस हुई कि कितने घोटाले हुए हैं। सुषमा जी ने एक के बाद एक कई घोटाले गिनाए। उनमें से सीएजी ने जब रिपोर्ट दी कि स्पेकट्रम स्केम में ...( व्यवधान) जोशी जी यहां बैठे नहीं हैं, वे आपको बताते कि पब्लिक एकाउंट्स कमेटी में क्या हुआ। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing else will go on record.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing else will go on record.

…( व्यवधान)

श्री लाल कृष्ण आडवाणी :संजय जी, मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है, अपनी-अपनी प्रकृति होनी चाहिए, मैं अपनी प्रकृति से बोलता हूं। मैं यह कह रहा हूं, जिस समय सीएजी ने कहा कि 1,76000 करोड़ का घाटा हुआ है।...( व्यवधान) देश को घाटा हुआ है, इसलिए घोटाला, तो सारे देश में उसकी इतनी चर्चा हुई कि जैसे मानों इससे बड़ा कोई घोटाला हुआ नहीं। मैं उससे बड़ा जो घोटाला हुआ, उसकी चर्चा अभी नहीं करूंगा, लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा, मैंने देखा कि घोटालों की चर्चा मेरे भाषणों में ज्यादा नहीं सुनते थे, महंगाई की चर्चा भी मेरे भाषणों में ज्यादा नहीं सुनते थे, लेकिन जब मैं काले धन की चर्चा करता था तो बहुत ध्यान से सुनते थे, क्योंकि उन्होंने पहले सुना नहीं कि भारत का इतना बड़ा धन विदेशों में पड़ा हुआ है। आज तक सरकार ने अपना अनुमान नहीं बताया कि सरकार के अनुमान से भारतीयों का कितना धन विदेशों में है, लेकिन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी नाम की एक संस्था है, थिंक टैंक है, एनजीओ है, जिसने अपने अंदाजे लगाए हैं। मैं कभी-कभी यह देख कर खुश होता हूं कि ये या तो ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी को कोट करते हैं या भारतीय जनता पार्टी का जो टॉस्क फोर्स है, उसके अनुसार सरकारी जवाबों एवं वक्तवयों में आता हैं, उसके अनुसार विदेशों में इतना अमाउंट है। मैं ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी को साधारणतया ठीक मानता हूं और उनके अनुसार वहां पर जो अमाउंट है, यहां तो स्पेकट्रम स्केम में 1,76000 करोड़ का घाटा हुआ होगा, लेकिन वहां पर ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी के अनुसार 25 लाख करोड़, ये तो दो लाख करोड़ से भी कम हुआ, लेकिन 25 लाख करोड़ स्विटजरलैंड के बैंकों में जमा है। और मैं तो प्रायः अपने भाषण में यह कहता था कि अगर प्रणव जी, मनमोहन सिंह जी यह सारा एमाउण्ट यहां ले आयें तो मैं तो सुझाव दूंगा कि यह सारा का सारा एमाउण्ट देश के 6 लाख गांवों में इन्वैस्ट कर दो और 6 लाख गांवों में इन्वैस्ट करोगे तो हिन्दुस्तान का ‘रूरल इंडिया वुड बिकम सो डैवलप्ड कि दुनिया के सारे देशों की पहली पंक्ति में खड़ा हो जायेगा।’ ऐसा कोई गांव नहीं बचेगा कि जहां पर अच्छा स्कूल न हो, जहां अच्छी डिस्पेंसरी न हो, जहां के किसानों को अपने खेत के लिए पर्याप्त जल न हो, जहां बिजली न हो, जैसे हमारे सारे प्रदेशों में अभी भी कुछ प्रदेश हैं, जहां पर उन्होंने पूरे के पूरे प्रदेश में बिजली उपलब्ध करा दी है, वहां बिजली एवेलेबल है। वैसी स्थिति हिन्दुस्तान के 6 लाख गांवों में हो जायेगी तो इसको सुनकर लोगों को लगता था कि ऐसा वास्तव में क्यों नहीं करते, इसमें दिक्कत क्या है। अब यह तो वित्त मंत्री जी जवाब में बताएंगे कि क्यों नहीं किया, अब तक क्या हुआ है?...( व्यवधान)

श्री अनंत कुमार (बंगलौर दक्षिण): यू.एन. कंवेंशन को साइन नहीं किया था।...( व्यवधान)

श्री लाल कृष्ण आडवाणी :नहीं-नहीं, वह तो एक बात है, क्योंकि, कई दिनों तक तो हमको सूचना मिलती थी कि यह 2003 में कंवेंशन हो गया, 140 देशों के साथ हमने साइन कर लिया, लेकिन उसको रैटीफाई करने में हम 2011 तक पहुंच गये। 2011 में एक बार आया था, प्रधानमंत्री कहीं विदेश जा रहे थे, जाने से पहले उन्होंने कहा कि अब रैटीफाई भी हो गया। बहुत अच्छी बात है, देर आयद-दुरुस्त आयद, लेकिन क्यों इतना विलम्ब हुआ, मैं नहीं जानता हूं। बताया गया कि एक मिनिस्टीरियल कमेटी बननी थी, वह बनने में देर क्यों की, थोड़े दिन में वह तो बन गई, ये सारी बातें डिटेल की हैं, लेकिन कुल-मिलाकर के यह इप्रैशन है, जो सुप्रीम कोर्ट ने भी पूछा कि सरकार इस मामले में जितनी प्रो-एक्टिव होनी चाहिए, वह नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट कह रहा है, मैं नहीं कह रहा हूं और प्रो-एक्टिव होना चाहिए, यह क्यों नहीं हुआ, इसका एक्सप्लेनेशन मैं उत्तर में जरूर एक्सपैक्ट करूंगा। पिछले दिनों में सरकार की ओर से ही एक प्रश्न के उत्तर में यह कहा गया कि हम ब्लैकमनी के बारे में एक व्हाइट पेपर जल्दी इश्यू करेंगे। यह सरकार की ओर से कहा गया, मुझे बहुत खुशी है। मैं चाहूंगा कि आप व्हाइट पेपर जल्दी से जल्दी प्रकाशित करें। व्हाइट पेपर ऑन ब्लैकमनी।...( व्यवधान)





नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री (डॉ. फ़ारूख़ अब्दुल्ला): मैं आपको इण्टरप्ट करने के लिए माफी चाहता हूं, लेकिन जहां आप ब्लैकमनी की बात करते हैं, वहां मैं आपसे गुजारिश करता हूं, हमें सबसे बड़ी मुश्किल जो है, वह हवाला से जो पैसा आ रहा है, उसने हमारी रियासत जम्मू-कश्मीर में हमारा बेड़ा गर्क किया है। उसकी भी यह जो एक्टिविटी चल रही थी, यह सारा हवाला का पैसा है, उसके बारे में आप क्यों नहीं कहते?

श्री लाल कृष्ण आडवाणी :हां-हां, मैं आपकी बात को एन्डोर्स करता हूं और मैं यह कहता हूं कि मैं पढ़ना नहीं चाहता हूं, लेकिन अगर मैं आपके सामने पढ़कर सुनाऊं कि हसन अली के बारे में क्या कुछ हुआ है, क्या डिटेल्स हुई हैं तो वह सारा का सारा हवाला का ही रैकेट है और उस व्यक्ति को अचानक कभी कोई नोटिस मिलता है, कभी गायब हो जाता है और यहां तक कि मेरी जानकारी में एक स्टेज पर वह और उसकी पत्नी स्विटज़रलैंड में सिटीज़न बनने के लिए भी आवेदन देना चाहते थे, दे दिया था या देना चाहते थे, बनना चाहते थे और इसीलिए कहा गया कि इसका जो पासपोर्ट है, इसको लौटाना नहीं चाहिए। ऐसी सारी डिटेल्स हैं, जो समझ में नहीं आता कि हिन्दुस्तान में हो क्या रहा है और अगर वित्त मंत्री जी विस्तार से बतायें कि हसन अली का केस है क्या। यह है कौन, उसका क्या-क्या सम्बन्ध है, किस-किस से सम्बन्ध है?...( व्यवधान) वह बाद में आयेगा।

मैं चाहूंगा, पिछले दिनों में क्योंकि, अपनी यात्रा जब मैंने समाप्त की तो आखिरी दिन पर घोषणा की थी, मैंने कहा है कि इन दिनों में ब्लैकमनी के इश्यू की चर्चा करते हुए जब मैं लोगों को यह बताता हूं कि बहुत सारे भारतीयों ने स्विटज़रलैंड के बैंकों में या इस प्रकार के अन्य टैक्स हैवंस में पैसा जमा करवाया है। तब किसी ने सुझाया, कहा कि ऐसा तो नहीं कि सांसदों ने भी करवाया हो। मैंने कहा कि मुझे नहीं पता। किसी अखबार में एक बार न्यूज छपी थी कि तीन सांसदों के नाम भी सरकार के पास आए हैं। मैंने कहा कि कम से कम मैं सोचूंगा कि मेरी पार्टी के सभी सदस्य जाकर अध्यक्ष जी को और उधर सभापति जी को डिक्लेरेशन लिखकर दे दें, एफीडेविट दे दें कि हमारे पास कोई पैसा नहीं हैं। मैं तो अपील करूंगा, ...( व्यवधान) जैसे अध्यक्ष जी, सदन के सारे सांसदों से एसेट्स की डिक्लेरेशन लेती है, जैसे इलेक्शन कमीशन सभी कंडीडेट्स से लेता है, वैसे ही क्यों न यह भी डिक्लेरेशन लिया जाए, एफीडेविट लिया जाए कि हमारे पास कोई विदेशी धन नहीं है, विदेशी संपत्ति नहीं है, विदेशी एकाउंट नहीं, अनलेस इट इज लेजिटीमेट। अगर मानो हममें से कोई विदेश में व्यापार करता है, धंधा करता है, उसका लड़का कुछ काम करता है, इसके कारण उसको वहां पर एकाउंट खोलना पड़ता है, तो वह उचित है, लेजिटीमेट है, इसमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इल्लीगल एकाउंट नहीं है। यह डिक्लेरेशन हमारी सभी पार्टियां करें, सब सांसद करें। मैं इसलिए भी कहता हूं कि इस बात को स्वीकार करना होगा कि चाहे यह एलीगेशन सही नहीं है, लेकिन आज बहुत लोगों को राजनेताओं की आलोचना करने में रस आता है कि बाकी सारे जो लोग हैं, वे तो फिर भी ईमानदार हैं, लेकिन जो राजनेता हैं, वे बड़ी बेईमानी करते हैं। मैं मानता हूं कि इस प्रकार के वोल्युंटरी कदम उठाने से ...( व्यवधान) यह गलत है। मैं मानता हूं कि किसी भी देश में ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम (मुम्बई उत्तर): यह तरीका ठीक नहीं है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठिए। आप क्यों खड़े हैं?

…( व्यवधान)

श्री लाल कृष्ण आडवाणी :किसी भी देश में जब नैतिकता के मूल्यों का अवमूल्यन होता है, तो उसका असर समाज के सभी वर्गों पर पड़ता है, उससे कोई अछूता नहीं बचता है। यहां तक कि अध्यापक और डाक्टर भी इससे प्रभावित होते हैं, लेकिन लोकतंत्र में राजनीति में कार्य करने वाला व्यक्ति हर समय लाइम लाइट में होता है, फोकस में होता है। उसकी थोड़ी सी गलती भी बाकी लोगों से ज्यादा दिखती है और इसीलिए लोगों को सुविधा होती है। आप देखेंगे जिस समय राजनेताओं की आलोचना होती है, तो तालियां बजती हैं। यह सही नहीं है, लेकिन ऐसा है, यह फैक्चुअल है। मैं मानता हूं कि इस प्रकार के वोल्युंटरी कदम उठाने से भी उसके कारण कुल मिलाकर हम राजनेताओं के बारे में इज्जत पैदा करेंगे। यह बात अलग है कि मैं मांग करता हूं कि कानून भी बनना चाहिए। वित्त मंत्री जी इस बारे में भी सोचेंगे।

मुझे यह उल्लेख करना उचित लग रहा है, इसी में मैंने देखा था, जो पूरा प्रस्ताव था, उसमें प्रस्ताव का एक हिस्सा यह भी था। इस प्रस्ताव में कहा गया कि विश्व भर में कन्वेन्शन अगेंस्ट करप्शन मनाते हुए उन्होंने कहा कि विश्व भर में 9 दिसंबर को एंटी करप्शन डे मनाया जाना चाहिए। यह सब देशों को कहा। हमारे देश ने अभी तक तो तय नहीं किया, लेकिन 9 दिसंबर को जाकर लोकसभा की अध्यक्षा को और उधर राज्य सभा के चेयरमैन को हमने अपनी-अपनी सारी डिक्लेरेशंस दे दिए। मैं चाहूंगा ...( व्यवधान) मैंने इसीलिए सबसे अपील कि सब वोल्युंटरी इसे करें और लॉ बनाने के लिए प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री आगे बढ़ें। वह लॉ जो है, वह न केवल स्पीकर को देने का हो, लेकिन हर कंडीडेट के लिए, मैं केवल सांसदों की बात नहीं कर रहा हूं, मैं सब विधायकों को, सांसदों को, जो कंडीडेट बनते हैं, उनको भी, सबको जिस प्रकार से यह आवश्यक है कि वह अपने-अपने एसेट लिख कर दें। वैसे ही उस का एक फार्म होना चाहिए। ...( व्यवधान) महोदया, वित्त मंत्री जब उत्तर देंगे तो मैं चाहूंगा कि जितनी भी रिपोर्ट छपी हैं इन रिस्पेक्ट ऑफ फ्रांस ने हम को जो नाम दिए है, किसी में छः सौ लिखा है तो किसी में सात सौ लिखा है। एक स्विटजरलैण्ड बैंक का हैं। हमारा फ्रांस के साथ डय़ूल एग्रीमेंट है that is not barred. हम किसी के साथ अगर एग्रीमेंट करते हैं तो अगर उन्होंने फ्रांस में पैसा कमाया हो और यहां पर भी पैसा कमाया हो तो उससे डबल टैक्सेशन बचेगा। उनको स्विटजरलैंड के एचएसबीसी बैंक से मिले हैं। उन्हें कैसे मिले हैं? उन्होंने भी जर्मनी की तरह निकाले होंगे। हो सकता है कि लिचटेन्सटेन बैंक की तरह निकाले होंगे। किसी व्हिसिल ब्लोवर को, हमारे लिए ह्यूमिलिएशन होगा कि हम को वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री से जानकारी न मिले और कल हम को जुलियन असांजे वर्ष 2012 में विकीलिक्स में बता दें कि ये नाम हैं। अभी-अभी हिन्दुस्तान टाइम्स के लीडरशीप सम्मिट में वे स्वयं तो नहीं आए क्योंकि वे लंदन में हाउस अरेस्ट हैं लेकिन उन्होंने वहां से विडियो पर भाषण करते हुए कहा कि मेरे पास नाम है। स्वीटजरलैंड की बैंकों में जिन भारतीयों के नाम हैं उनकी मेरी पास जानकारी है। इस समय जानकारी देने वाला एलमर जो व्हिसिल ब्लोवर है उस व्हिसिल ब्लोवर के खिलाफ केस चल रहा है। उसका केस खत्म हो जाएगा तो मैं वर्ष 2012 में सब नाम बताऊंगा। हमारे लिये ह्यूमलिएटिंग है कि हम को विकीलिक्स से पता लगे कि क्या होता है और कैसे होता है? एक बार पहले भी उन्होंने जानकारी दी जो हमें पहले नहीं थी लेकिन उन्होंने जानकारी दी। That has been denied by him. He is not there in those 26 also. That is not correct. आप के पास जो भी नाम आए हैं उनको आप प्रोटेक्ट मत करीए। हमारा भी कोई नाम हो तो आप जरूर बताइएगा। ...( व्यवधान) दूसरी बात मैं यह कहना चाहूंगा कि व्हाइट पेपर जो आप प्रकाशित करें उसमें आप ने आज तक इस दिशा में क्या-क्या प्रयत्यन किया कि हमारा सारा धन वापस आए। जिस प्रकार से दुनिया के बहुत सारे देशों ने, मुझे याद है कि एक पार्लियामेंट्री डेलिगेशन में मैं आस्ट्रेलिया गया था। It was way back in 1974. it was led by the then Parliamentary Affairs Minister Mr. Raghuramaiah. On the way, I dropped at Philippines. मैं फिलीपिन्स रूका था। उन दिनों फर्डीनन मारकोस वहां के राष्ट्रपति थे। उनके करप्शन के बहुत किस्से सुने। बाद में पता चला कि उन के बाद जो महिला राष्ट्रपति सुश्री अकीनो आई। उस ने Commission for good Government, उसको पहला-पहला यह टास्क दिया कि मारकोस की जितनी सम्पत्ति थी और जो इल गॉटेन वेल्थ थी जो उसने अमेरीका, सिंगापुर और स्विटजरलैंड में जा कर रखी है उसको वापस लाओ। ये सारे रिपोर्ट देख कर पता लगा कि अभी-अभी मारकोस का सारा केस खत्म हुआ है। उनकी सारी सम्पत्ति वास्तव में आई है। वह फिलीपिन्स में चली गई है। उसमें यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन अगैनस्ट करप्शन से बहुत बड़ी सहायता हुई है। मैं मानता हूं कि These documents have changed the whole situation. सीलिए स्विटजरलैंड भी बार-बार कहता है कि हमसे कोई कहे तो सही, हम सहायता करने के लिए तैयार हैं, वापिस देने के लिए तैयार हैं। Unless we are interested in seeing that the names do not come out. आम लोगों में यह बात फैलती है। मैं नहीं कहता लेकिन बात फैलती है कि प्रोटैक्ट क्यों करना चाहते हैं, जबकि मैं कह रहा हूं कि अगर हमारे भी कोई अपराधी हैं तो होना चाहिए, सामने आना चाहिए, डरना नहीं चाहिए। This is an occasion....( व्यवधान)

श्री अनंत कुमार : वर्ष 2012 के बाद क्यों?...( व्यवधान)

श्री लाल कृष्ण आडवाणी : वर्ष 2012 के बाद क्यों है, वे स्वयं समझाएंगे, मेरी समझ में नहीं आता। हमारी तरफ से किसी को ऐग्ज़ैम्ट नहीं करना चाहिए। यह नहीं होना चाहिए कि वर्ष 2012 के बाद प्रॉसपैक्टिव होगा, रिट्रॉसपैक्टिव नहीं होगा। पहले किसी ने किया होगा तो भले ही करे। मैं तो इस पक्ष में भी नहीं हूं कि टैक्स लेकर बात खत्म कर दें। Do not do it. दंडित होना चाहिए...( व्यवधान) नहीं तो फिर कोई दूसरा जन-आंदोलन करेगा। प्रधान मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं। मैंने पहला-पहला अपना पत्र काले धन के बारे में प्रधान मंत्री जी को वर्ष 2008 के आरंभ में लिखा था, जब जर्मनी ने एलटीजी बैंक लिचटैनस्टिन के कुछ नाम कहे थे कि हमने दो हजार लिए हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ 600 जर्मनी के हैं, बाकी दुनिया के बाकी देशों के हैं। मैंने प्रधान मंत्री जी को पत्र लिखा कि हो सकता है कि हमारे भी हों। इसीलिए आप पता लगाइए कि क्या कोई हमारे हैं। अगर हों तो उनसे नाम मांगिए। उन्होंने कहा कि we would be willing to share this data with any country which approaches us without charging any fees. उन्होंने ये शब्द कहे। तब पता लगा कि आपने उस समय के वित्त मंत्री जी को कहा। वित्त मंत्री जी ने मुझे जवाब दिया कि हमने उन्हें एप्रोच किया है। उन्होंने अभी तक कुछ नहीं दिया है। लेकिन सालभर बाद उन्होंने शायद 16, 18 नाम दिए। सालभर बाद जो नाम दिए, वे भी आपने किसी को नहीं बताए कि हम नहीं बता सकते। बाकी सारी दुनिया बता सकती है, हम नहीं बता सकते। मैं चाहूंगा कि आज की इस महत्वपूर्ण चर्चा के बाद जिसे एडजर्नमैंट मोशन के माध्यम से महोदया ने स्वीकार किया है, आप पूरे के पूरे नाम बताने का वचन सारी संसद को दें। ...( व्यवधान) पूरी की पूरी सूची उजागर कीजिए। साफ-सुथरी सूची होनी चाहिए। किसी को छुपाने की जरूरत नहीं है।...( व्यवधान) मैं बार-बार बात नहीं करता, लेकिन प्रधान मंत्री जी ने कहा था। First, I was ridiculed. मैंने जब यह बात कही। अभी भी कभी-कभी रिडिकूल होता हूं कि 25 लाख करोड़ की राशि कहां से लाई है। I do not worry about this kind of ridiculing approach. इसे स्वीकार करना पड़ता है। मुझे खुशी तब हुई जब आपने स्वयं कह दिया कि सौ दिन के अंदर हम अपना काम शुरू करेंगे। अब सौ दिन के बजाए सात सौ दिन हो गए। इसीलिए मैं चाहूंगा कि सदन को संतोष होना चाहिए, देश को संतोष होना चाहिए कि इस काले धन के मामले में सरकार is willing to place all the cards on the table and tell the whole world that this is the situation. We have nothing to hide. आप करेंगे तो आपके पक्ष में बहुत होगा। यह स्थिति अच्छी नहीं है, क्योंकि मेरे कहने के बाद, मुझे याद है कि हर अपने भाषण में बाबा रामदेव जी अपने प्रवचन में जिक्र करते थे। उनकी अपनी फॉलोइंग है। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि एक दिन अचानक उनके ऊपर जो हमला हुआ, ऐसा हमला हुआ जिसका कोई अर्थ नहीं था। या तो पांच-पांच मंत्री जाकर उनका स्वागत करें या पांच दिन बाद नाराजगी हो गई तो रात को सोए हुए उनके ऊपर हमला कर दिया गया।...( व्यवधान) Shri Kapil, are you responsible? एक महिला अस्पताल में थी जो मर गई और पुलिस कहती थी कि हमने कुछ नहीं किया, वह वैसे ही हो गया। बहुत दुख की बात है। ऐसा मत करो। क्या होता है? इन सारी बातों के कारण आप अपने एलायंस को ए कर रहे हैं, सदन को कर रहे हैं। इसलिए मैं प्रणब जी, प्रधान मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि आप काले धन के विषय में पूरे फैक्ट्स सदन के सामने रखें। इसके अलावा मैंने जो सुझाव दिये हैं, उन्हें आप स्वीकार करें।





MADAM SPEAKER: Motion Moved:

“That the House do now adjourn.”



SHRI MANISH TEWARI (LUDHIANA): Thank you Madam, Speaker for giving me an opportunity to articulate my views on a subject of such global import. It is very propitious that this discussion is being held in this House at a point in time when the world is confronted with the possibility of a global recession. You have a double dip staring you in the face and public finances around the world are under astray.… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Please let us have order in the House.

श्री मनीष तिवारी : मैं माननीय आडवाणी जी की राय से बिल्कुल इत्तफाक रखता हूं कि जो सामान्तर अर्थव्यवस्था है। what we call as a shadow economy or a parallel economy, it saps the vitality of the nation. It denies legitimate revenue which should go to the Government. It corrupts the electoral system and most importantly, आडवाणी जी ने यह बात बिल्कुल सही कही कि टैक्स इवेजन ऑफ प्रोसिड्स और क्राइम में फर्क है। इसलिएI will endeavour to divide my presentation into three parts. First, I will try and apprise this august Assembly the nature, an extent and the magnitude of the problem. What is the nature of the beast that we are dealing with.

दूसरा, सरकार ने इस काले धन को बाहर निकालने के लिए पहल की है और तीसरा, जो कुछ मुद्दे आडवाणी जी ने उठाये हैं और जो सार्वजनिक चर्चा में कई दिनों से आ रहे हैं, उनका जवाब देने की मैं चेष्टा करूंगा। यह जो काले धन का मामला है, इसके दो पहलू हैं। एक आंतरिक पहलू है और बाहर का पहलू है यानी एक्सटर्नल डायमैंशन है, जिसके ऊपर आज यह काम रोको प्रस्ताव लाया गया है। जो आंतरिक पहलू है, वह भी उतनी ही जरूरी है जितना कि एक्सटर्नल डायमैंशन। आज यह अनुमान लगाया जाता है कि भारत की जो अर्थव्यवस्था है, जीडीपी है, वह दो ट्रिलियन डालर है। सरकारी आंकड़े तो अभी मौजूद नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञों का यह मानना है कि भारत में जो सामान्तर अर्थव्यवस्था है, जो पैरलल इकोनॉमी है, वह शायद लगभग एक ट्रिलियन डालर है। आज भारत की जनसंख्या 121 करोड़ है। उसमें से 65 प्रतिशत लोग खेती-बाड़ी से संबंधित हैं। They are excluded from the tax net under Section 10 of the Income Tax Act. उसके बावजूद इस देश में 42 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिनको कर देना चाहिए। अगर उसमें से हम 12 करोड़ ऐसे लोगों को निकाल दें, जो बुजुर्ग हैं या ऐसे व्यवसाय में लगे हैं कि उनमें कर देने की क्षमता नहीं है, तो 30 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिनसे इस देश में कर वसलूना चाहिए। लेकिन इस मुल्क में कितने कर उपभोक्ता हैं? 64 साल बाद 3 करोड़ 35 लाख सिर्फ कर उपभोक्ता हैं। मैं ये आंकड़े सिर्फ इसलिए इस सदन के समक्ष रख रहा हूं कि हर साल 30 करोड़ ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी इनकम टैक्स नेट से बाहर जाती है and this gives us an idea of the kind of internal parallel economy, the kind of internal black money which is generated annually in this country.



13.00 hrs.

जो विदेशी पहलू है, जिसके ऊपर यह स्थगन प्रस्ताव लाया गया है, उसके बारे में एक चीज जाननी बहुत जरूरी है। यूरोपियन यूनियन ने 1990 के दशक के मध्य में एक स्टडी की थी, जिसमें बहुत चौंका देने वाले तथ्य सामने आए थे। दुनिया में 206 ऐसे मुल्क हैं, जिन्हें प्रिफरेंशियल टैक्स रिजीम कहा जाता है, or which can colloquially be called as tax havens. एक अंतर्राष्ट्रीय बैंक है, जिसे बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स कहते हैं। उस बैंक का यह अनुमान है कि वर्ष 1980 के बाद half of all the banking assets and liabilities of the world अर्थात दुनिया की आधे से ज्यादा बैंकिंग एसेट्स एवं लायबिल्टीज हैं, they flow through one tax haven or another. One-third of the total FDI, जो विदेशी पूंजी निवेश होता है, सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में, उसका एक-तिहाई हिस्सा किसी न किसी टैक्स हैवेन के थ्रू जाता है। माननीय आडवाणी जी ने जिक्र किया।...( व्यवधान) यूनाइटेड नेशन्स की कॉमर्स और ट्रेड की जो संस्था है, उसने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2007 में पूरे विदेशी पूंजी निवेश की जो मात्रा थी, वह 1.7 ट्रिलियन डॉलर्स थी। वर्ष 2010 में आर्थिक मंदी के कारण वह घटकर 1.2 ट्रिलियन डालर रह गयी, परन्तु चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 1980 से लेकर वर्ष 2011 तक इस विदेशी पूंजी निवेश में टैक्स हैवेन्स का हिस्सा 26.2 प्रतिशत से बढ़कर 33.6 प्रतिशत हो गया। इसका क्या मतलब है?

13.02 hrs.

(Dr. M. Thambidurai in the Chair)

इसका मतलब यह है कि हर तीसरा डालर, जो दुनिया में कहीं भी निवेश किया जाता है, वह किसी न किसी टैक्स हैवेन के थ्रू रूट किया जाता है। ये आंकड़े मैं आपके सामने इसलिए रख रहा हूं क्योंकि इस सदन और इस मुल्क को यह जानने की जरूरत है कि यह जो समस्या है, जिसके ऊपर आज बहस हो रही है, यह कितनी विकराल है, इसका जो विकराल रूप है, वह किस तरह से फैला हुआ है।



सभापति महोदय, आडवाणी जी ने अपना वक्तव्य देते हुए टैक्स हैवेन्स का जिक्र किया। I would like to draw the attention of this House as to what is a tax. यह टैक्स हैवेन किस बला का नाम है। A tax haven is nothing else except a sovereign country. At this point in time, there are 206 such preferential tax regimes or tax around the world. Now, what do these tax havens do? टैक्स हैवेन करते क्या हैं? यह टैक्स हैवेन्स ऐसी नीतियां और कानून बनाते हैं जिनसे जो अंतर्रा­ट्रीय पूंजी है, a particular kind of mobile global capital is attracted to these tax havens. What do they offer? वह पूंजी यहां क्यों नहीं आती, वह उन टैक्स हैवेन्स में या उन देशों में ही क्यों जाती है, क्योंकि वहां ईजी इनकारपोरेशन कर सकते हैं, 24 घंटे में आप कंपनी शुरू कर सकते हैं। उसके अलावा जीरो टैक्सेशन और सबसे बड़ी बात कांफिडेंशियालिटी एंड सीक्रेसी की गारन्टी देते हैं। यहां पर जिक्र हुआ स्विटजरलैण्ड का। मैं सदन को बताना चाहता हूं कि जिस कानून का माननीय आडवाणी जी ने जिक्र किया है, उसके बावजूद भी आज स्विटजरलैण्ड में एक कानून है, Article 47 of the Swiss Banking Laws of 1934 and what does that Law say? It says that “Anybody, who is a bank employee, commits a criminal offence if he divulges any information with regard to any bank account....” यह फौजदारी का मामला उस के ऊपर तब नहीं बनता अगर किसी विदेशी सरकार को वह सूचना दे, यह फौजदारी का मामला तब भी बन जाता है अगर वह अपनी सरकार को भी सूचना दे। बात सही है, yes, there are exceptions to the rule. Money laundering and proceeds of crime are exempted from this rule. But then the country which asks for information. वह देश जो यह सूचना मांगता है, उसे यह प्रमाणित करना पड़ता है अपने कानून के तहत ही नहीं, स्विट्जरलैंड के कानून के तहत भी कि यह अपराध हुआ है, यह व्यक्ति गुनाहगार है, जिसके बारे में यह सूचना मांगी जा रही है।

जैसा मैंने पहले कहा कि यह जो टैक्स हैवंस हैं, जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं, बेसिकली तीन किस्म के हैं। There are three kinds of tax havens. The first one of those which are linked to the erstwhile British empire. They are centred around the city of London. They are fed by something called the Euro market. They consist of the Crown Dependencies, the territories, the pacific atolls, Hong Kong and Singapore. यह दूसरी बात है कि हांगकांग अब चीन को चला गया है। दूसरे यूरोपीयन टैक्स हैवंस हैं, ये आज नहीं बने थे, ये 1920 और 1925 में बने थे, जिसे कहते हैं, जिसे कहते हैं ज्यूरेक ज्यूक एंड लाइवइन टाइन ट्रैंगल। तीसरे जो एमर्जिंग इकोनॉमी थी, जो दुनिया के उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं, उन्होंने भी इसी तरह की नीतियां बनाईं हैं, जैसे पनामा है, उरुग्वे है, दुबई है। इन सब मुल्कों की अगर आप परिभाषा निकालें एक अर्थनीति के हिसाब से, all of them can actually qualify to be called the tax havens. यह सारा जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि यह ऐसा नहीं है यह बहुत सरल सी चीज है कि आपने जाकर सूचना मांगी और उस देश ने सूचना दे दी। वास्तविक्ता यह है कि हर देश ने या इन देशों ने इस तरह के कानून बनाए हुए हैं, जिससे इस तरह की जो केपिटल है, पूंजी है, उसे वह संरक्षण देते हैं। हां, यह बात सही है कि जो ढांचा बना हुआ है, उसे तोड़ने की कोशिश की जा रही है। पर यह जो एक भ्रम फैलाया जा रहा है, this canard which is being spread that as if the entire problem of black money has originated because of the UPA Government, I think nothing can be more untrue. इससे गलत बात और कोई नहीं हो सकती कि जो कालाधन की समस्या है, यह यूपीए सरकार ने पैदा की है।...( व्यवधान) वास्तविकता यह है कि it is a legacy issue. The problem of black money is linked to the economic models that we have adopted. It is linked to the taxation statutes that we have put in place, the taxation rates that we have followed and more importantly और मुझे इस बात को कहने में शर्म महसूस होती है कि कालाधन की समस्या जो हमारे सारे प्रचार की नीति है, जो इलेक्टोरेल फाइनेंस है, उससे भी जुड़ी हुई है इसलिए उसमें भी सुधार करने की जरूरत है।

यहां पर कई किस्म के आंकड़े रखे गए कि भारत का कितना धन विदेशी बैंकों में जमा है। भारतीय जनता पार्टी की जो टास्क फोर्स है, वह कहती है कि 25 लाख करोड़ रुपए से 70 लाख करोड़ रुपए तक है। ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी संस्था का जिक्र किया गया। वह कहती है कि 213 बिलियन यूएस डालर्स है, जो आज की कीमत में 462 बिलियन यूएस डालर्स होगा। लेकिन अभी तक किसी को अनुमान नहीं है कि कितना धन भारत का विदेशी बैंकों में जमा है। इसलिए यूपीए सरकार ने पहल की और मार्च 2011 में इसकी जांच करने के लिए एक स्टडी कमीशंड किया, जो यह पता करे कि भारत के अंदर और बाहर कितना ऐसा कालाधन है, कितनी बड़ी यह समानांतर अर्थव्यवस्था है, जिससे पता लग सके। उसके बाद कदम उठाए जा सकें, उसे वापस लाया जाए। ऐसा नहीं है कि पहली बार इस तरह की स्टडी की गई हो। सन् 1985 में जब कांग्रेस पार्टी की सरकार थी, जिसने नेशनल इंस्टीटय़ूट आफ पब्लिक पालिसी फाइनेंस को कमीशन किया था स्टडी करने के लिए कि इस देश में कितना कालाधन है। उस समय उसकी रिपोर्ट थी कि 36,786 करोड़ रुपए and that 16.5 per cent of the Indian GDP is the extent of our parallel economy. इसीलिए वर्ष 2009 के बाद जब एक अंतर्राष्ट्रीय आम सहमति बनी, when there was a consensus that we need to deal with these tax havens, we need to break the walls of secrecy, the UPA had put in place a five-pronged strategy to deal with the menace of black money. What did that strategy consist of? It consisted of a legislative framework and upgradation of implementation systems. ऐसे लोगों को ट्रेंड करना जो काले धन का पता लगा सकें, ऐसी संस्थाएं बनाना, जो इनके खिलाफ लडाई लड़ सकें और सबसे जरूरी जो एक अंतर्राष्ट्रीय आम सहमति बन रही है, उसका नेतृत्व करना जिससे कि काला धन वापस आ सकता है। पिछले ढाई साल में ये जो सारे कदम उठाए गये हैं। The steps which have been taken by the UPA have yielded results. अपडेट किये गये हैं और जो नटोरिएस टैक्स हैवन्स हैं, भामास, बरमूडा, ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड्स, आईल ऑफ मैन, कैमन आईलैंड्स, जर्जी, मॉनेको, सेंट-कीट्स, नवास, मार्शल आई लैंड्स, ऐसे जो टैक्स हैवन्स हैं, इनके साथ टैक्स इन्फोर्मेशन एक्सचेंज एग्रीमेंट के ऊपर हस्ताक्षर किये गये हैं। उसके तहत 333 दरख्वास्ते इन मुल्कों को भेजी गयी हैं कि हां, आपके देश में ऐसे भारतीय नागरिक हैं, जिनके खाते हैं, उनके बारे में आप जानकारी दीजिए। कई देशों में से इंफोर्मेशन सोर्स की गयी है, ऐसे खातों के बारे में। इस सबका नतीजा क्या है Rs. 34,145 crore worth of mis-pricing has been detected. अब यह मिस-प्राइसिंग क्या चीज है, सभापति महोदय। एक समय था, आडवाणी जी ठीक कह रहे थे 9/11 से पहले जबकि अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में ब्लैक-मनी थी जो हवाला के माध्यम से जाया करती थी। लेकिन जैसे-जैसे बैंकिंग-लॉ सख्त होते गये ट्रंसफर-प्राइसिंग के माध्यम से, ओवर-इन्वोएसिंग के माध्यम से, अंडर-इन्वोएसिंग के माध्यम से पैसा अंदर-बाहर लाया जाता है और इसीलिए सरकार ने कड़ाई करके 34,145 करोड़ रुपया जो इस तरह से मिस-प्राइस किया गया था उसे ट्रेस किया है। 18,750 करोड़ रुपये की जो कंसील्ड इन्कम है, उसे बाहर निकाला गया है और उसमें से 3 हजार करोड़ रुपया ऐसा है जो पिछले 6 महीने में सरकार ने सर्चिज करके, सीजर करके डिटेक्ट किया है। जहां तक विदेशी बैंकों से सूचना की बात है, फ्रांस ने 70 लोगों की सूचना दी और उन 70 लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गयी तथा 400 करोड़ रुपये से अधिक का कर वसूल किया गया और उनके ऊपर फौजदारी की कार्रवाई जारी है। ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, please do not interrupt.

Nothing, except the speech of Shri Manish Tewari, will go on record.

(Interruptions) …*

SHRI MANISH TEWARI : Sir, a reference was made to the Hasan Ali case. I would just like to read out one excerpt from the BJP Task Force Report on black money. It says:

“The ED gave Ali one month notice to reply to the Showcause notice and also explain how his fund grew from an initial deposit of 1.5 million dollars in 1982 to a low of 560 dollars in 1997 to 969 dollars in 1997 to 8 billion dollars by 2006.”



Sir, let us pause here for a moment. In 1982 this gentleman had 1.5 million dollars in his account and it came down to 560 dollars by 1997. Who was in office from 1982 to 1996? It was the Congress Government in office. In 1996, the Congress Government demits office and the money rises to 969 million dollars. Then, Sir, between 1997-2006, the money rises to eight billion dollars. Out of those nine years, who was ruling this country for six years? It was the NDA which was ruling.… (Interruptions) Was it not their responsibility, if this was Indian money, to find out as to how this money was siphoned off and how did this money go abroad? What action have they taken to ensure that this money was not siphoned off out of this country? " हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और। " मैं इसके ऊपर कोई जजमेंट नहीं देना चाहता हूं, लेकिन हाउस की समझ पर छोड़ना चाहता हूं कि ये आंकड़े अपनी कहानी अपनी जुबानी कह रहे हैं।

महोदय, आडवाणी जी ने Lichtenstein के मसले की बात कही। आडवाणी जी की मैं व्यक्तिगत तौर पर बहुत इज्जत करता हूं। रामजेठ मलानी जी की याचिका का जिक्र किया और पूछा कि Lichtenstein जो के नाम हैं, वो Lichtenstein के नाम सरकार बता क्यों नहीं रही है। मैं आपकी अनुमति से सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका का आर्डर पास किया है, उसके सिर्फ दो पैराग्राफ पढ़ना चाहता हूं।



सुप्रीम कोर्ट कहती है कि:

“The rights of citizens, to effectively seek the protection of fundamental rights, under clause 1 of Article 32 have to be balanced against the rights of citizens and persons under Article 21. The latter cannot be sacrificed on the anvil of fervid desire to find instantaneous solutions to systemic problems such as unaccounted monies, in which vigilante investigations, inquisitions and rabble rousing, by masses of other citizens could become the order of the day. The right of citizens to petition this Court for upholding of fundamental rights is granted in order that citizens, inter-alia, are ever vigilant about the functioning of the State in order to protect the constitutional project. That right cannot be extended to being inquisitors of fellow citizens. An inquisitorial order, where citizens’ fundamental right to privacy is breached by fellow citizens, is destructive of social order. The notion of fundamental rights, such as a right to privacy as part of right to life, is not merely that the State is enjoined from derogating from them. It also includes the responsibility of the State to uphold them against the actions of others in the society, even in the context of exercise of fundamental rights by others.”



The Court concludes by saying:

“In these circumstances, it would be inappropriate for this Court to order the disclosure of such names, even in the context of proceedings under clause (1) of article 32.”



यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। जो लोग यह पूछते हैं कि लाइसेंस टाइम के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए, उनका जवाब यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, जो एक जनहित याचिका, जिसे भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद ने कोर्ट में दायर की थी, उस पर सुनाया गया है। मैं इस बहस को यूपीए बनाम एनडीए नहीं बनाना चाहता हूं। बीजेपी ने यात्रा निकाली। हम उनका स्वागत करते हैं, क्योंकि हम भी चाहते हैं कि जो काला धन विदेशों में पड़ा है, वह बाहर आए। लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि इनकम टैक्स एक्ट में एक सैक्शन 138 है। इसके बारे में मैंने माननीय वित्त मंत्री जी से पिछले मानसून सत्र में सवाल पूछा था। वह सैक्शन 138 predates the Right to Information Act by 40 years. And what does that Section 138 say? It says that any citizen can approach the concerned Commissioner to get information about any assessee. I would like to ask the Bharatiya Janata party on this point. They are very concerned about black money. Did they go and approach the Income Tax Department to get any information about any assessee who has black money before they went on this yatra? क्या वे कभी कर विभाग के पास सूचना मांगने के लिए गए कि इन व्यक्तियों पर हमें आशंका है कि इनके पास विदेशों के बैंकों में काला धन जमा है, इनके बारे में आप सूचना दीजिए। ऐसा नहीं किया, क्योंकि मंशा काला धन वापिस लाने की नहीं है, बल्कि काले धन के मुद्दे का राजनीतिकरण करने की है।

आज यहां पर कहा गया कि एनडीए कि जितने सांसद हैं, उन्होंने एक डिक्लेरेशन दी है कि उनका किसी विदेशी बैंक में कोई पैसा जमा नहीं है। मैं उनका स्वागत करता हं पर उसके साथ साथ यह डिक्लेरेशन क्यों नहीं दी गई कि हमारे पास देश में भी कोई काला धन नहीं है।...( व्यवधान) क्या देशी और विदेशी काले धन में ये फर्क करते हैं? ये जो राजनीतिक नाटक है, इससे काला धन वापस नहीं आने वाला।

Mr. Chairman, I want to bring it to your attention and the attention of this House that there are three sectors in India which are the biggest consumers of black money. First is the real estate; second is the gold, bullion, etc.; and the third is the Mauritius route, which is called round-tripping of black money. रियल एस्टेट का जो सैक्टर है, उसमें ब्लैक मनी की जनरेशन के लिए जो प्रावधान थे, उनको किसने डाइल्यूट किया? एनडीए की सरकार ने। धारा 37 (i) किसने हटाई? एक जुलाई 2002 को धारा 37 (i) की जो डिक्लेरेशन थी जिससे कर विभाग को यह पता लगता थर कि जब भी कोई प्रोपर्टी ट्रंसफर होती थी कि वो अंडर वैल्यूड नहीं है, उसको किसने हटाया? एनडीए ने।...( व्यवधान) जो इंकम टैक्स एक्ट की धारा 230 ए है, जिसके तहत आपको कोई भी प्रोपर्टी खरीदने से पहले कर विभाग की परमिशन लेनी पड़ती थी कि आपके कोई आउटस्टैंडिंग टैक्स डय़ूज तो नहीं हैं, उसको 1 जुलाई 2001 को किसने हटाया? आपकी एनडीए की सरकार ने।...( व्यवधान)

The interesting thing about the Mauritius route is that there was a Circular called 789, which was issued on 13th April, 2000 by the NDA Government. What did that Circular do? It prevented the assessing officers from finding out whether a person was a bona fide resident of Mauritius or not. क्योंकि उससे होता क्या था? होता यह था कि कोई भी व्यक्ति मौरेशियस से सर्टिफिकेट ले आया कि हां, हम वहां रहते हैं और उसके ऊपर कोई कर नहीं लगेगा। इसके पहले आयकर विभाग के पास ये अख्तियार थे कि आप कोई भी प्रमाण देते थे तो उस प्रमाण की जांच होती थी। इसी तरह से 1 जून 2003 को जो इंकम टैक्स विभाग की सर्च एंड सीजर की पॉवर थी, वह डाइल्यूट की गई जिससे the gold and bullion which were unaccounted, which used to be seized earlier does not get seized. I can give you far more examples to show the manner in which the NDA, during those six years, actually diluted the provisions of the law. … (Interruptions) Shri Yashwant Sinha, I am concluding. … (Interruptions) You can speak after me. … (Interruptions) The NDA Government diluted the provisions of the law to generate black money.

सभापति महोदय, इसलिए मैं अपनी बात यह कहकर समाप्त करना चाहता हूं कि कृपा करके इस मुद्दे का राजनीतिकरण न किया जाए। एक आम सहमति बन रही है, ...( व्यवधान)There is a global consensus being generated whereby we can bring the black money back. Do not dilute it by politicising it. … (Interruptions) Thank you very much. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Order please.

… (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA (HAZARIBAGH): Mr. Chairman, there are some facts which have to be put squarely before the House. Shri Manish Tewari has referred to certain developments, certain amendments which took place during the NDA time when I was the Finance Minister. So, I have a right to clarify. I had no wish to intervene in this debate. I am not physically fit to intervene in this debate. But I cannot let that go unchallenged for the simple reason that that is untrue.

The Mauritius Double Taxation Avoidance Agreement was concluded between India and Mauritius in 1982, when Shrimati Indira Gandhi was the Prime Minister of India. The Mauritius route was opened for Foreign Direct Investment and for Foreign Institutional Investment when the present Prime Minister was the Finance Minister in 1993. As far as the NDA Government is concerned, we did not do anything except to continue what had already been in existence for years. This is point number one. The second point that he referred to was in respect of a certain circular which was issued by the Central Board of Direct Taxes (CBDT) in April, 2000. He did not complete the story. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : There should be no comments. Please listen to him what he says.

… (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA: He is a very distinguished lawyer. He quoted the Supreme Court judgments in this House. What he failed to mention was that that circular was challenged in the Delhi High Court. The Delhi High Court gave a judgment against the Government. The Government went to the Supreme Court. The Supreme Court not only upheld its circular as absolutely valid, but they even reprimanded the Delhi High Court for having wrongly interpreted the law. That is the true fact. Therefore, you can twist facts by ignoring facts and you can twist facts by telling wrong facts. That is exactly what my friend Mr. Manish Tewari has done. … (Interruptions)

SHRI MANISH TEWARI : It is not about twisting of the facts. It is merely because the Supreme Court decides to uphold an order of the Government it does not mean that the intent may not have been misconceived. What has been the implication of that circular? The implication of that circular is that since 2000 to 2011 the powers which were there with the Government in order to verify whether a person is a bona fide resident of Mauritius or not whereby he can avail of tax exemption, that power was taken away. … (Interruptions) I would like to ask Shri Yashwant Sinha who was the then Minister of Finance that what was the benefit which was flowing to the Government of India as a result of bringing that circular. If he wants to have a discussion on Circular No. 789, I am prepared to have a discussion on that Circular No. 789. … (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA : Mr. Chairman, Sir what the Member again has failed to mention is that in the Government’s affidavit to the Supreme Court, we had very clearly stated that round tripping of Indian money going abroad and returning to India via Mauritius will not be covered by the Double Taxation Avoidance Treaty and each such case will be thoroughly investigated by the Income Tax Department. That was our stand. … (Interruptions)





MR. CHAIRMAN: Nothing will go in record.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN: I have called Shri Mulayam Singh Yadav. There should be order in the House.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I am calling for the order of the House.

… (Interruptions)

श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी):माननीय सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इस महत्वपूर्ण बहस में बोलने का अवसर दिया। काला धन कहां जा रहा है? इसे कहना चाहिए चोरी का धन। काला धन जनता नहीं समझ पा रही है। यदि चोरी का धन कहेंगे तो आम जनता में यह बात फैलेगी और जनता समझेगी। सभापति महोदय, काले धन की जगह जब इसे चोरी का धन बताएंगे तब जनता को समझ में आएगा। मैं चोरी के धन के बारे में बोलने के लिए आपके सामने खड़ा हुआ हूं।

जहां तक चोरी के धन की बात है, इस बात का बड़ा आश्चर्य है और दुख भी है कि भारत सरकार पर जितना विदेशी कर्जा है, उससे लगभग दो गुना चोरी का धन है। जोÉÊ´É विभिन्न विदेशी बैंकों में है। अगर वह किसी तरह से वापस ले आया जाए तो देश का पूरा का पूरा कर्जा खत्म हो जायेगा, पचास करोड़ जनता के बच्चों तक को खाना मिलने के अवसर पैदा हो जायेंगे और देश का विकास होगा। लेकिन क्या सरकार ऐसा करने की हिम्मत करेगी? यह काम वही सरकार कर सकती है, जिस सरकार में हिम्मत हो। हमें लगता है कि इस सरकार में हिम्मत नहीं है कि यह चोरी का धन हिंदुस्तान में वापस ले आये और उसका उपयोग देश के विकास और गरीबों को विशेष सुविधा देने में कर सके। यह हमारी सरकार से मांग है।

मैं कहना चाहता हूं कि बहुत बड़ी मात्रा में विदेशों में देश का काला धन जमा है, उसे वापस लाया जा सकता है, सरकार उसे वापस ला सकती है और मुझे विश्वास है कि इस बहस के बाद सरकार इस दिशा में प्रयास करेगी। आडवाणी साहब ने कह दिया है और हम भी कह रहे हैं कि हमें विश्वास है कि वित्त मंत्री जी विदेशी बैंकों में हिंदुस्तान का जो पैसा जमा है, उसे देश के विकास के लिए और गरीबों के हितों के लिए वापस लायेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि वित्त मंत्री जी अपने जवाब में इसका ऐलान करेंगे।

महोदय, हम आंकड़ों में ज्यादा नहीं पड़ना चाहते, लेकिन जो आंकड़े हमें प्राप्त हुए हैं, उनके अनुसार पिछले वर्ष तक विदेशी बैंकों में हमारे 205 खरब रुपये जमा थे। यह आंकड़ा अमरीका की एक संस्था जी.एफ.आई. द्वारा दिये गये हैं और यह बताया गया है कि इस रकम में साढ़े ग्यारह प्रतिशत धनराशि प्रतिवर्ष बढ़ रही है। यह धनराशि भारत के कुल विदेशी कर्ज से 25 गुना ज्यादा है। हम इसे दोगुना ही समझते थे। लेकिन जो अमरीका की संस्था ने बताया है, उसके अनुसार यह 25 गुना ज्यादा है। यदि सरकार इसे वापस लाने में सफल हो जाए तो उससे न केवल विदेशी कर्जा पूरा हो जायेगा, बल्कि गरीबी की रेखा से नीचे जीवन जी रहे 50 करोड़ लोगों को रोजाना भोजन भी मिलने लगेगा। यह बहुत बड़ा काम है, यदि यह काम किया जायेगा तो मैं उसके लिए सरकार को धन्यवाद दूंगा। मैं समर्थन भी दे रहा हूं, इसलिए हमारी जिम्मेदारी है और हम कह सकते हैं कि आपको इस काम को करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि वित्त मंत्री जी इसके लिए भरपूर प्रयास करेंगे और विदेशी बैंकों में जो चोरी का धन जमा है, उसे वापस लाने में सफल होंगे।

दूसरा सवाल टैक्स चोरी रोककर चुनाव सुधार करने का है। देश में टैक्स की जो चोरी हो रही है, उस पर भी सरकारें कई बार चोरों को मौका दे चुकी हैं कि इतने समय तक जितना भी टैक्स छिपाया गया था, उसे ओपन करें, देश की जनता को बतायें तो उनका धन नम्बर एक में बदल दिया जायेगा। ऐसा मौका कई बार दिया गया है। लेकिन बार‑बार मौका देने के बाद भी देश में टैक्स की चोरी भारी पैमाने पर हो रही है। इसे रोकने के लिए सरकार क्या करेगी, यह वित्त मंत्री जी को अपने उत्तर में जरूर बताना चाहिए। भारत में भी चोरी के हजारों करोड़ रुपये मौजूद हैं। ये सिर्फ विदेशों में ही नहीं है, अकेले भारत में भी हजारों करोड़ रुपये का काला धन, चोरी का धन मौजूद है। इसे आप बहुत जल्दी वापस ले सकते हैं और आज की बहस के बाद हमें उम्मीद है कि आप टैक्स चोरी के धन को वापस लेंगे। आजकल आये दिन अखबारों में खबर छपती है कि चपरासी, छोटे अफसरों और आईएएस अधिकरियों के पास से अकूत धन प्राप्त हो रहा है। मैं कहना चाहता हूं कि केवल राजनीतिज्ञों पर ही हमला होता है, लेकिन नम्बर दो का सबसे ज्यादा काला धन नौकरशाहों के पास मौजूद है। लेकिन आप उस पर नहीं बोल रहे हैं। हमें उम्मीद थी कि आडवाणी साहब इस पर भी बोलेंगे, लेकिन नौकरशाहों के पास भी बहुत बड़ी मात्रा में काला धन कहिये या चोरी का धन कहिये, मौजूद है। इंदौर से एक चपरासी पकड़ा गया था उसके पास से 19 करोड़ रूपये बरामद हुए थे। इससे पहले मध्य प्रदेश के दो आईएएस अधिकारियों के पास से 400 करोड़ रूपये बरामद हुए थे। हम राजनीतिज्ञ लोग तो बदनाम हो रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा पैसा, चाहे उसे काला धन कहिए या चोरी का धन कहिए वह सबसे ज्यादा नौकरशाहों पर है। नौकरशाही पर है, नौकरशाहों पर है, वे लोग रोजाना ही धन लेते हैं। औरों को धन मिलता है महीना-दो महीना, 6 महीना या साल भर में लेकिन उन्हें रोजाना मिलता है। जो चपरासी सचिवालय में होते हैं वे अधिकारी से मिलाने के लिए भी दफ्तर के गेट पर रूपया लेते हैं। यह एक महीने से मेरी जानकारी में आया है। तभी तो मध्य प्रदेश में चपरासी के पास से 19 करोड़ रूपये बरामद हुए हैं। अगर हर प्रदेश में इस तरह के छापे मारे जाएं तो अकेले चपरासी पर ही नहीं नौकरशाहों के पास से बहुत सारा धन बरामद होगा। हम राजनीतिज्ञों पर तो छापे मारे ही जा रहे हैं। हमारे कई राजनीतिक लोग तो इसी सवाल को लेकर जेलों में बंद भी हैं और नौकरशाह केवल एक-दो ही जेल में पहुंचे हैं। वह तो अलग बात थी जो राष्ट्रमण्डल खेल कराने में पकड़ा गया था। उस नौकरशाह को जेल भेजा गया है। उस नौकरशाह को मैं जानता हूँ उसने मेरे साथ काम किया है। हम नहीं जानते थे कि यह भी ऐसा निकलेगा। अगर नौकरशाहों पर अंकुश लगेगा तो चोरी का धन इतना मिलेगा कि पूरे देश का विकास हो सकेगा। हिंदुस्तान के अंदर 50 करोड़ गरीब हैं, उनको भी लाभ होगा। न केवल विकास होगा बल्कि सरकार पर भी जनता को विश्वास होगा। अगर आप यह काम कर देंगे तो आप चुनाव जीतेंगे। हम विपक्ष के लोग देशहित में ही बात कर रहे हैं। भले ही हम अल्पमत में रह जाएं लेकिन आप अच्छा काम करेंगे तो हम लोग सहयोग देंगे और चुनाव में भी आपको लाभ होगा। आप फिर से सरकार बना सकते हैं। आज के दिन ऐसे हालात हैं कि मजबूरी हो जाएगी और ये ही लोग सरकार बनाएंगे। इनको मौका मत दीजिए। इनको मौका देंगे तो हमें इनका भी विरोध करना पड़ेगा। ऐसा न करें कि हम विपक्ष में ही बने रहें, केवल विपक्ष की राजनीति करें। शरद यादव जी क्या आप और हम लोग विपक्ष की राजनीति ही करते रहेंगे, हम लोगों को सोचना पड़ेगा। कुछ न कुछ ऐसा करना पड़ेगा जो सरकार में पहुंचे। कैसे-कैसे लोग सरकार में चले गए? आप कैसे लोगों को सरकार में ले रहे हैं जो कभी इधर कभी उधर चले जाते हैं। आप इनको भी सरकार में ले चुके हैं।

कृपया कर के हमारी पार्टी को मत तोड़िए। आप हमारी पार्टी को तोड़ रहे हैं। हमारी पार्टी को तोड़ कर किसी को चेयरमैन बना दिया तो किसी को बड़ा पद दे दिया है। हम अच्छी तरह से जानते हैं कि उनको कमाने वाला पद दे दिया है।

आडवाणी जी काफी बातें कह चुके हैं, हम उनको दोहराना नहीं चाहते हैं। वित्तमंत्री जी लेकिन हम यह कहना चाहते हैं कि अगर आपने यह कदम नहीं उठाया तो इस देश का नौजवान बहुत ज्यादा इंतजार नहीं करेगा। बेरोजगारी बढ़ रही है, पढ़े-लिखे लोग हैं वे समझते हैं। जहां कहीं भी ऐसा हो रहा है, जैसे लीबिया, सीरिया और मिश्र में, वहां भ्रष्ट शासकों के खिलाफ जिस तरह से आन्दोलन खड़ा हो गया है, उसी तरह से हिन्दुस्तान का नौजवान जो पढ़ा, लिखा, बेरोजगार है, वह सरकार के खिलाफ आन्दोलन करेगा। उन्हें किसी दल की जरूरत नहीं पड़ेगी, वे खुद आन्दोलन कर लेंगे और उन्होंने कहीं-कहीं आन्दोलन करना शुरू भी कर दिया है। कहीं 100-200 लड़के भ्रष्टाचार के खिलाफ जा रहे हैं और वे रोजगार मांग रहे हैं। इसलिए हम आपको सावधान करना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के नौजवान भी बहुत दिनों तक इंतजार नहीं करेंगे, जैसा लीबिया और विदेशों के बारे में बताया गया, इसलिए आप जल्दी से जल्दी ऐसा प्रयास कीजिये, काले धन का वापस लाइये और देश का विकास कीजिये। देश के 50 करोड़ गरीब लोगों को रोटी नहीं मिल रही है, उन्हें रोटी दीजिये। हम इसका पूरा समर्थन करेंगे। हम इतना ही संक्षिप्त में बोलना चाहते हैं।





श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): महोदय, आज आडवाणी जी के द्वारा जो एडजर्नमेंट मोशन लाया गया, उस पर आपने हमें बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। काफी देर से चर्चा शुरू हुई है और मैं देख रहा था कि जिस तरीके से पक्ष और विपक्ष खासकर बीजेपी और कांग्रेस में आपस में वाकयुद्ध चल रहा था, उससे देश में एक संदेश जा रहा था। लोग सोच रहे थे कि इस काले धन के लिए कौन जिम्मेदार है, क्या केवल यही दोनों पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं? आज मैं कहना चाहता हूं कि आज पूरे देश में इस बात को लेकर बैचेनी है। आज अनुमान के ऊपर चर्चा हो रही है, 25 लाख करोड़, 30 लाख करोड़, इनके पास कोई फैक्ट नहीं है कि कितना ब्लैक मनी इस देश का विदेश में है? मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि इस देश में रहने वाला गांव का गरीब, जो आज बैचेनी का शिकार हो रहा है, उसके पास पूरा का पूरा आंकड़ा है, अगर वह काला धन देश में आ जायेगा तो इस देश की तकदीर और तस्वीर बदल सकती है। मैं उन आंकड़ों में नहीं जाना चाहता क्योंकि जब सत्ता पक्ष के पास और मुख्य विपक्षी दल के पास कोई आंकड़ा नहीं है तो मेरे पास तो कोई आंकड़ा रहने का सवाल ही नहीं है। मैं इतना जरूरी कहना चाहता हूं कि आजादी के 63 सालों में इस देश में रहने वाला गांव का गरीब, जो रोजी-रोटी के लिए तड़प रहा है, साफ पानी के लिए परेशान है, गांव का वह गरीब जिसे जाड़े के दिन में गरम कपड़ा और रात में रहने के लिए छत नहीं मिलती है, आज वह परेशान है। उसकी जुबान पर उस काले धन को लेकर जो इच्छा पैदा हो रही है कि शायद विदेश से वह काला धन, 25 लाख करोड़, 30 लाख करोड़ जो भी हो, अगर देश में वापस लाया जाये तो इस देश की गरीबी दूर हो सकती है। आज पूरे देश में हर दुकान पर, चट्टी-चौराहे पर चर्चा होती है तो अमीर और गरीब सभी लोगों की जुबान पर सिर्फ काले धन का ही नाम आता है। वह काला धन इस देश की अर्थव्यवस्था का दोगुणा है, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि विदेश में कितना धन जमा है? आज उसे लेकर देश की गरीब जनता चिंतित है और वह चाहती है कि वह काला धन अपने देश में वापस लाया जाये। यही नहीं, जब यह कहा गया कि किन-किन लोगों का काला धन वहां जमा है, जिसके पास दस लाख डॉलर होगा, वही वहां खाता खुलवा सकता है तो इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस देश का गरीब नहीं, आजादी के 63 साल में जो पचासों साल तक इस मुल्क का मालिक था, उसका वहां पर खाता है, विदेशों में इस देश के गरीब लोगों का खाता नहीं है। अमीर लोगों का जो काला धन है, बार-बार सरकार गंभीरता से कहती है कि हम 100 दिन के अन्दर इन नामों को डिसक्लोज करेंगे, इन नामों को सबके सामने लायेंगे।





सुप्रीम कोर्ट के कहने के बाद भी अभी तक आधी सूची उन्होंने सौंपी है। पूरी सूची सौंपने में कौन सी परेशानी है? मैं कहना चाहता हूँ कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई से आज़ादी के 63 सालों में यह देश जहाँ पहुँचा है, तो देश की सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है इसलिए उसे देश की जनता के सामने उस सूची को प्रकाशित करना चाहिए।

श्री शत्रुघ्न सिन्हा (पटना साहिब): आपका सौ दिन वाला बहुत अच्छा पॉइंट है।

श्री दारा सिंह चौहान : हमारे माननीय वित्त मंत्री जी बड़े विद्वान हैं, वे सब कुछ सुनते हैं। वे गुस्सा भी होंगे तो मुझे कोई तकलीफ नहीं है। मैं जानता हूँ कि गुस्सा आना प्रैक्टिकल है।

महोदय, आज 300 से ज्यादा दिन हो गए लेकिन इसके बाद भी सरकार ने अपना वायदा पूरा नहीं किया। ...( व्यवधान) 700 दिन से ज्यादा हो गए हैं। इसलिए मैं आपके माध्यम से माननीय वित्त मंत्री से कहना चाहता हूँ कि देश की जनता जो आज भूख से परेशान है, जिसे साफ पानी नहीं मिलता, आज देश का नौजवान रोज़ी रोटी के लिए घूम रहा है, आज वह परेशान है। इसकी वजह काला धन है। वह काला धन अगर हमारे देश में वापस आ जाए तो हमारी गरीबी दूर हो सकती है, हमारी तकदीर बदल सकती है। लेकिन मुझे लगता है कि देश की सरकार उस काले धन पर गंभीर नहीं है। अगर गंभीरता दिखाई होती तो पिछले दो सालों से काले धन पर इस सदन में जो अवरोध पैदा हो रहा है, वह अपरोध पैदा नहीं होता बल्कि इस काले धन के जो फैक्ट्स एंड फिगर्स हैं, वह देश की जनता के सामने आ गए होते। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मैंने पढ़ा कि इस काले धन पर सरकार की तरफ से कोई माफी की योजना है। माननीय वित्त मंत्री जी बैठे हैं। वे अपने उत्तर में बताएँगे कि वह कौन सी माफी योजना है? यदि गरीब को आपने लोन दे दिया तो न चुकाने पर वह थाने में चला जाता है, लेकिन जिसने इस देश के हज़ारों करोड़ रुपये लूटकर काला धन विदेश में जमा किया है, उनके लिए माफी योजना लाने की संभावना पर आप विचार कर रहे हैं। उसके पीछे क्या कारण है, इस पर भी सदन में बताया जाना चाहिए। बार-बार अगर देश मुसीबत में खड़ा होता है तो आप राष्ट्रमंडल में जाते हैं, राष्ट्रसंघ में अपनी बात कहने के लिए, अपनी बात मनवाने के लिए उनके संरक्षण में जाते हैं, लेकिन जब राष्ट्रसंघ ने आपको आदेश दिया कि किसी भी देश का काला धन यदि किसी विदेशी बैंक में जमा है तो समूचा काला धन उस देश की तकदीर और तसवीर को बदलने के लिए उस देश को वापस करना चाहिए। लेकिन उस पर भी देश की सरकार गंभीर नहीं है।

सभापति जी, मैं एक बात और कहना चाहता हूँ जो हमारे अनेक विद्वान वक्ताओं ने कही है कि यदि वह समूचा काला धन भारत में आ जाए तो इस देश की तकदीर बदल सकती है। इसी सदन के नेता सदन छोड़कर आज देश के दूसरे हिस्से और प्रदेशों में घूम रहे हैं और दस साल का वक्त मांग रहे हैं, जिन्होंने इस देश की आज़ादी के बाद देश पर ही नहीं, बल्कि प्रदेशों पर भी राज किया, आज देश की जनता के सामने जाकर वे हाथ फैला रहे हैं कि वक्त दीजिए, दस साल में हम देश की तस्वीर बदल देंगे। मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूँ कि यदि भारत सरकार उस काले धन पर गंभीर हो जाए और वह विदेशों में रखा धन अगर भारत में आ जाए तो मैं दावे से कहना चाहता हूँ कि देश की तसवीर और तकदीर पाँच साल में बदल जाएगी।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया।







श्री शरद यादव (मधेपुरा):सभापति महोदय, आज अडवाणी जी के एडजर्नमेन्ट मोशन को स्वीकार करके बहस हो रही है। बहस में मोटा-मोटी बहुत सी बातें आ गयी हैं।

महोदय, इस देश का दुर्भाग्य देखिए कि हम अभी तक यह पक्का नहीं कर पाए हैं कि भारत का कितना धन टैक्स हैवन देशों में जमा है। हमें इसके दो काल खण्ड करने होंगे। वर्ष 1991 में नरसिम्हा राव जी की सरकार बनी थी, जिसमें मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री थे। वर्ष 1991 के पहले का एक कालखण्ड है और दूसरा है वर्ष 1991 के बाद का कालखण्ड। ये दोनों ही हमारे सामने गुजरे हुए इतिहास हैं। यह चर्चा कोई एक दिन की नहीं है। देश भर के प्रबुद्ध और समझदार लोग जानते हैं कि स्वीटज़रलैण्ड एक देश है, जिसमें बहुत पैसा जमा है। वहां सीक्रैसी एक्ट है, इसलिए पता नहीं चल सकता है। 9/11 को जब अमेरिका पर हमला हुआ और बहुत अफसोसनाक था, जिसमें बहुत लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने यह कदम उठाया कि इस पैसे का उपयोग कहीं आतंकवाद को बढ़ाने और विस्तार करने में तो नहीं हो रहा है। उन पर हमला होने के बाद उन्होंने देखा कि इसके पीछे कौन सी शक्तियां हैं। उनके सामने यह बात भी आयी कि विदेशों में जो पैसा जमा है, वह दुनिया के आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। उसके बाद यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने यह फैसला किया कि इस पर कोई न कोई कदम उठाना चाहिए। स्विटज़रलैण्ड तो उनका सगा भाई है, उनका हमजोली है। स्विटज़रलैण्ड में जो पैसा जाता है, स्विटज़रलैण्ड तो बहुत छोटा देश है, पूरा यूरोप उस पैसे का इस्तेमाल करता है। तब ये बात आयी। जब से ग्लोबलाइजेशन का दौर शुरू हुआ है। मैं नहीं कह रहा हूं कि यह नहीं होना चाहिए। सदियों से बाजार का विस्तार हो रहा है। देश में हो रहा है, दुनिया में हो रहा है। जैसे ही इंसान की कौम के पास साधन आ रहे हैं, फैल रही है। वर्ष 1991 के बाद से जब से बाजार को खोला गया है, तब से काली कमाई करने वाले के पास तीन चीजों से पैसा आया है। पहला तो आईटी सेक्टर है, जिसकी चर्चा और जिक्र पूरे हिन्दुस्तान भर में है और सुप्रीम कोर्ट में है। 27 आदमी इसी सदन के बंद हैं, प्रयास से, पुरुषार्थ से और बहस से। जो लोग कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ, मैं उनकी बात नहीं मानता हूं। यही सदन जिसने हमारे 11 साथी थे, जिन्होंने 30 या 50 हजार रुपए पकड़ लिए थे। उन्हें इसी सदन की कुर्सी से सोमनाथ बाबू ने तेरह दिनों में सजा दी। वह हमारे हाथ में था। इस सदन के पुरूषार्थ में था। दुनिया की कोई अदालत नहीं होगी, कोई हाउस और सदन नहीं होगा जिसने तेरह दिनों में अपने साथियों को सजा देने का काम किया होगा। लेकिन वह आपके हाथ में था। जबसे अमेरिका के ट्विन टावर पर हमला हो गया, तब से इस चर्चा में तेजी आई है। आडवाणी जी ने ठीक कहा कि उसके बाद तेजी आई है। वहां केवल हिन्दुस्तान का पैसा जमा नहीं है, दुनिया में जितने तरह के विकासशील देश हैं, उनका नाम मैं लूंगा तो आप मुझे वक्त नहीं देंगे, उन सबने वहां टैक्स हैवन देश में गरीब मुल्कों का पैसा दे दिया। यह केवल हमारे देश की कहानी नहीं है। दुनिया भर के देश हैं जिनका पैसा वहां जमा है। अब मौका मिल गया है, क्योंकि जो दुनिया का मालिक है, उसे लगा कि आतंकवाद उनके घर और उनकी दहलीज़ पर आ गया और बहुत बुरी तरह से आ गया, तब यह चर्चा हुई। अकेले भारत ही नहीं, कोई भी देश स्विस बैंक से पैसा नहीं ला पाया। लेकिन यह देश कोई छोटा देश नहीं है। जितने पिछड़े देश हैं, जितनी विकासशील इकॉनोमी हैं, यूरोप और अमेरिका के बाहर की बाकी दुनिया है, उस दुनिया में भारत सबसे ज्यादा ताकतवर देश है, लेकिन हम भी यह काम नहीं कर पा रहे हैं। जर्मनी से नाम मिलते हैं तो हम कहते हैं कि उनकी शर्त्त टूट जाएगी, करार टूट जाएगा। फिर हम जो आगे लोगों का नाम लाना चाहते, वह नहीं ला पाएंगे, प्रणब दादा यही कहते हैं। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका पर ये शर्त्तें, बंधन क्यों नहीं लगीं? अकेले बंधन इसी देश पर क्यों लग रही है? इसका मतलब है कि हम 63 सालों में इतना भी नहीं कर पाए कि बराबरी कर सकें, बल्कि हम अपने हक को और अपने हक की बात को मनाने की ताकत पैदा कर पाते। प्रणब बाबू, तीन चीजों में हिन्दुस्तान का पैसा है। यह काला धन बाहर नहीं है, भीतर भी है। आप रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट जब चेंज करते हैं, कदमताल करते हैं, वह इसलिए फेल हो जाता है कि भारत की जो अर्थव्यवस्था है, भारत का जो बजट है, उससे ज्यादा काला धन इसी देश में पड़ा हुआ है। आप चले जाइए दिल्ली के आसपास जमीन खरीदने के लिए, जमीन में सफेद पैसा दिया जाएगा 50 लाख रूपए और काला धन दिया जाएगा डेढ़ करोड़ रूपए। यह ज्यादा भी हो सकता है। यह काला धन तीन चीजों में है। एक तो आई.टी. में है। आई.टी. का विस्तार और विकास भी हुआ है। आप टू-जी स्पेक्ट्रम देख लीजिए। सभापति महोदय, इसका मतलब अब धरती भी बिक रही है और आकाश भी बिक रहा है। पाताल और पानी का भी अपनी तरह से चीन कह रहा है कि आप यहां समुंदर में खोज नहीं कर सकते।

14.00 hrs.



मैंने कहा कि यह जो पैसा है, आईटी है, वह तो मेग्नेट है, तरंगो का बेचना है, वह बहुत कीमती है। तीन चीजों में - रियल एस्टेट, जो 27 लाख हैक्टेयर जमीन बिकी है, प्रणब बाबू, देश भूखों मरेगा। दिल्ली बसी, लेकिन हिन्दुस्तान के सबसे ज्यादा ज़रखेज इलाके की जमीन पर एक तरह से ऐसा हमला हुआ, जिसका आप अंदाजा नहीं कर सकते। हम लोग यहां के रहने वाले नहीं हैं, लेकिन यहां पर हमारे बहुत रिश्तेदार हैं। हम जानते हैं कि कैसी तबाही और बर्बादी हो रही है। इस देश के अंदर इन तीन चीजों में और जो नक्सलवाद है, उसके पीछे हिन्दुस्तान का जो ट्राइबल एवं आदिवासी इलाका है, जो मूलवासी है, उसी इलाके में सबसे ज्यादा सम्पत्ति है। वहां अभ्रक, सोना, कोयला, लोहा, ताम्बा, हर चीज वहीं है। उसकी ऐसी लूट मची है कि कुछ लोग तो इसके कारण जेल में बंद हैं। देश भर में यदि सबसे ज्यादा किसी इलाके में तबाही मची हुई है, सम्पत्ति लूट रही है तो वह आदिवासी इलाका है। अमेरिका और चीन के लोग अपना ऑयरन-ओर एक तोला भी नहीं बेच रहे हैं। चाहे गोवा हो या देश के अन्य भागों में हम लोग इसे लूटा रहे हैं। हम कल आने वाले भविष्य को भी और आने वाले हमारे जो बच्चे हैं, उनके लिए भी हम अपने घर को इतना खाली एवं कंगाल कर रहे हैं कि वे हमारे नाम पर रोएंगे। ये नक्सलवाद कुछ नहीं है, वहीं से आया है।

अभी आडवाणी जी बोल रहे थे। वे 25 लाख करोड़ की बात कर रहे थे और हमारे यहां बजट ही 11 लाख करोड़ का है, ढाई साल का बजट है। ...( व्यवधान) हम तो दुनिया में कहीं गए नहीं हैं। बहुत सी जगहों के हिसाब-किताब दिए, उन्हें भी हम मानते रहे। हम तो सरकार और प्रणब बाबू की बात मानते हैं। ये बताएंगे। ये आंकड़े ही पता चल जाएं। कोई कह रहा है कि गांव ठीक हो जाएंगे, सड़क बन जाएगी, स्कूल बन जाएगा। पता चल जाए कि इसमें क्या हो सकता है? मैं कहता हूं कि जब यह पैसा आ जाए तो इस पैसे को किसी चीज में नहीं लगाया जाए, सिर्फ हिन्दुस्तान के खेत को पानी से जोड़ने का काम कर दें तो कोई दुनिया का मुल्क इनसे हाथ नहीं मिला सकता।...( व्यवधान) मैंने कहा कि मोटी चीज पर खर्च करिए। ...( व्यवधान) मैं तभी कह रहा हूं कि आ जाए, कोई अन्य नीचे के रास्ते से आ जाए। जो काला धन छिपा कर रखा है, उसके रास्ते आ जाए तो इस देश में कोई एक चीज है, जो हमने 63 साल में की होती तो हिन्दुस्तान के जिस इलाके में हमने पानी से खेत जोड़ दिया है, वह इलाका सम्पन्न हो गया है, ऊंचा हो गया है।



14.03 hrs.

(Mr. Deputy-Speaker in the Chair)



आप एक बात जान लीजिए कि हिन्दुस्तान जो है, सारे देश और दुनिया में घाघ और घाघिन का नाम जो है, वह होता नहीं है, लेकिन इस देश में कोई सबसे बड़ा कवि, जो मुल्क के विकास को सबसे ज्यादा गहराई से जानता था, वह घाघ और घाघिन था, वह पूर्वांचल का था। जब पूरे देश में पानी गड़बड़ा जाता है तो हर चीज बिगड़ जाती है। मौसम बिगड़ जाता है तो आपके यहां तबाही मच जाती है।

आपका बजट बिगड़ जाता है, काम बढ़ जाते हैं, हमारी खेती में धान और बाकी जो पैदावार हैं, प्रणब बाबू, मिट्टी के मोल बिक रहे हैं। आप कहते हैं कि हमने दाम बढ़ा दिये, लेकिन बढ़े हुए दाम की किसी को जरूरत नहीं है। मुझे इस पर इस समय चर्चा नहीं करनी, मैंने नोटिस दिया है, जब उसका समय आएगा, तब बोलूंगा। मुझे इतना ही कहना है कि आडवाणी जी ने जो सवाल उठाया है, वह हमारा ही नहीं है, आडवाणी जी का ही नहीं है, इस सदन में जितने लोग इधर बैठे हैं और उधर बैठे हैं...( व्यवधान)

एक माननीय सदस्य: वहां तो कोई है ही नहीं।

श्री शरद यादव : हाथी के पांव में सब का पांव। अगर प्रणब बाबू बैठे हैं तो फिर किसी की क्या जरूरत है। मैं तो इतना ही कहना चाहता हूं कि मैं नहीं मानता कि आप ईमानदारी से प्रयास नहीं कर रहे हो, लेकिन कूवत हमारी बहुत कम है। यूरोप और अमेरिका को छोड़कर किसी की भी कूवत कहीं दिखती नहीं है। हां, चीन ने जरूर हाथ मिलाया है, पहले जापान मिला हुआ था, अब चीन ने हाथ मिलाया हुआ है, लेकिन बाकी जगह में जो बाकी मुल्क हैं,...( व्यवधान) वह मैं दूसरे सन्दर्भ में कह रहा हूं। बाकी मुल्कों में किसी ने नहीं किया। यह कमाल हो जायेगा, यदि आपने पैसा लाने के प्रयास पर पुरुषार्थ करके नया जोश भरा तो पूरी दुनिया आपके लिए सलाम मारेगी। लेकिन उनके सारे कानून, उनकी सारी चीजें जब वे रैजोल्यूशन पास कर रहे हैं, तब हम लोग खड़े हो रहे हैं, चैतन्य हो रहे हैं, उसके पहले हम चैतन्य नहीं हुए। आडवाणी जी ने सही बात कही थी कि सिक्योरिटी काउंसिल ने जब यह बात कर दी, यू.एन.ओ. ने नहीं, सिक्योरिटी काउंसिल में, तो हम लोग जग गये।

अब हिसाब हो रहा है, कोई कह रहा है 20 लाख करोड़, कोई कह रहा है, 11 लाख करोड़, कोई कह रहा है, 50 लाख करोड़, बाबा रामदेव पता नहीं, कितना कह रहा है।

उपाध्यक्ष महोदय : अब समाप्त करिये।

श्री शरद यादव : ठीक है, खत्म करता हूं। उपाध्यक्ष जी, इसलिए मेरा आपके द्वारा सरकार से निवेदन है कि जो हकीकत है, हम कहां खड़े हैं, क्या कर सकते हैं, यह धन आएगा या नहीं आएगा, यहां आप ईमान को पकड़ कर चलिये और याद रखिये, हिन्दुस्तान में लोकतंत्र तभी चलेगा, जब ईमान चलेगा और सरकार यदि ईमान से आगे बढ़ जाये और ईमान से जवाब देना शुरू कर दे तो मैं मानता हूं कि यह रास्ता आज नहीं तो कल बन जायेगा। इसलिए आप यही बताइये कि इस मामले में सच्चाई क्या है, यह कितना रुपया है, कहीं हम लोग जो एक कहावत है कि मुंगेरी लाल के सपने ही तो नहीं देख रहे हैं। एक सीरियल है, मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही तो नहीं देख रहे हैं। सपने देखने वाला और मुंगेरी लाल के सपने देखने वाला बहुत पिछड़ जाता है। हमें अपनी हकीकत पता चल जाये, यही आपसे विनती है।

आप इतने दिनों से सदन में हैं, हम लोग और किसी से तो आशा नहीं करते, लेकिन आपसे आशा करते हैं कि इसमें थोड़ा इस बार आर-पार कर दीजिए। जो सच है, उस सच को जमीन में गाड़ दीजिए। सरकार आती है और जाती है, प्रणव बाबू जैसे लोग सरकार भर नहीं चलाते, आने-जाने का भी काम करेंगे, ऐसा अब उनके हाव-भाव से दिखता है। उन्होंने एक दिन कहा कि इस देश को क्या हो गया तो इस देश को क्या हो गया है तो दिखाइये, लौटाइये...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब समाप्त करिये, बोलने वाले और लोग भी हैं।

श्री शरद यादव : ताकिदेश भर के हम लोग भी सीना तान कर आगे चल सकें।





SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Sir, “Follow the money” was the short and simple advice given by the secret informant within the American Government to Bob Woodward, the journalist from Washington Post in aid of his investigations of the Watergate Hotel break-in.

Today the worries of the nation are with respect to transfer of monies and accumulation of monies, which are unaccounted for by many individuals and other legal entities in the country in foreign banks.

Today the worries of the nation are not only related to the quantum of monies, whether Rs.15 lakh crore or Rs.25 lakh crore or Rs.50 lakh crore, said to have been secreted away in foreign banks but also the manner in which they may have been taken away from the country, and also to the nature of activities that such monies may have engendered the accumulation of such monies.

Today the worries of the nation are also with regard to the nature of activities that such monies may engender, both in terms of concentration of economic power and also the fact that such monies may be transferred to groups and individuals who may use them for unlawful activities that are extremely dangerous to the nation, including actions against the State.

Today the worries of the nation also relate to whether the activities of engendering such unaccounted for monies and transferring them abroad.

Today we are worried how such monies be brought back. Everyone in the House will be asking for, how the monies would be brought back. That is the big and simple question which lies today.

The worries also relate to the manner and the extent to which the people are damaging both national and international attempts to combat the extent, nature and intensity of cross-border criminal activities.

Sir, very recently the Supreme Court has said, “Large amounts of unaccounted money have been taken from India to foreign countries. The individuals and entities of a country, who have stashed abroad such unaccounted for large monies, would suggest that the necessity of suspecting that they have been generating unlawful activities. In addition, such large amounts of unaccounted for monies would also lead to a natural suspicion that they have been transferred out of the country in order to evade payment of taxes, thereby depleting the capacity of the nation to undertake many tasks that are in public interest.”

This has not happened within one year or two years or five years. Decades after decades the monies are secreted away. It has to be stopped. Specific instances of Hasan Ali and Tapurias speak about running of the parallel economy of this country. These have to be stopped. At any cost, it has to be stopped. This has not grown up only in the last three years or four years. This is not the time where we are standing here and blaming from this side to that side or from that side to this side. If this is so and it has happened in our country, it is a failure on the part of all the Governments, the present and the previous, to prevent black money to be secreted away to the foreign banks.

Sir, very recently certain steps have been taken for bringing back the money parked in foreign banks. The Government has formulated a five-pronged strategy which comprises of: i) joining global crusade against ‘black money’, ii) creating an appropriate legislative framework, iii) setting up institutions for dealing with illicit funds; iv) developing systems for implementations; (v) and imparting skills to the manpower for effective action.

In April 2011, the Government set up a 10-member high level Supervisory Committee headed by the Revenue Secretary to suggest a legal framework to retrieve black money. We want to know from the hon. Minister that in the month of December, 2011 what report has come; what the Committee has worked out; and what information they can give it us so that to a certain extent they satisfy the people of this nation.

In May, 2011, the Government had constituted another Committee under the Chairmanship of Chairman, CBDT to examine ways to strengthen laws to curb the generation of black money, its illegal transfer abroad and its recovery.

Today, we want to know what steps have been taken by them. How far the Committee has functioned? What is the output of the Committee’s functions? The nation is eagerly waiting for that.

Today’s issue is not the issue of any particular party; today’s issue is the nation’s issue. Decades after decades the monies have been secreted away; today everyone has to rise to the occasion to prevent and stop it. The illustration which is given, the money is quantifying by one person to another person. Nobody knows as to whether how much monies have been secreted away from this country. Nobody can say what the exact quantum of money is. But, it reveals that a parallel economy is running in our country. At any cost, it has to be stopped.

With this, I thank you and conclude.



श्री बसुदेव आचार्य (बांकुरा): सभापति महोदय, आज सदन एक गंभीर विषय पर चर्चा कर रहा है। काम रोको प्रस्ताव के ऊपर चर्चा हो रही है। हम काले धन पर चर्चा कर रहे हैं। If we do not discuss the genesis of black money कहां से काला धन आता है? अगर हम यह चर्चा नहीं करेंगे तो हम इस को रोक नहीं सकेंगे।

We have adopted new liberal policy in 1991. Since 1991, what we have seen is that the proliferation of black money is to the extent of 80 per cent in our country. Black money was there prior to 1991. जो काला धन बढ़ा है वह केवल विदेशी बैंकों में नहीं है बल्कि देश में भी है। एक समय वांग्चू कमीशन ने बताया था कि हमारे देश में पांच हजार करोड़ रूपये का काला धन है। यह चालीस साल पहले था। आज कितना है और क्यों हुआ? What are the reasons? Why there is such proliferation of black money? What is its connection with the policy, the new liberal policy, which is being pursued by this Government? They have opened the gates; they have amended the laws and facilitated the proliferation of black money. What we have seen during successive Governments is that instead of cracking down the black money, they have announced Voluntary Disclosure Scheme, thereby black money was converted into white money by paying 30 per cent. No serious steps were taken in the past to quantify the black money. No serious action was taken against those persons, who were responsible for stashing the money in foreign banks. The Global Financial Integrity has given a report. जहां पर उन्होंने कहा है कि विदेशी बैंकों में सबसे ज्यादा काला धन हमारे देश का है। The largest percentage of black money, which is lying in the foreign banks, is of Indians. Three years back it was 232 billion dollars and today the value of the black money in foreign banks has increased to 462 billion dollars. That means, approximately Rs.20 lakh crore black money is lying in foreign banks..… (Interruptions)

सबको मालूम है, सरकार को भी मालूम है।

If the United States of America and some European countries can force the Government of Switzerland to disclose the names of the persons who have deposited money in the Swiss banks illegally, why cannot the Government of India take such action? It was when these countries faced recession that they tried, or rather forced the Swiss Government to disclose the names. But what has the Government of India done? They have taken five steps. What is the result? इसका नतीजा क्या हुआ? आपने तो पांच कदम उठाए लेकिन आज तक क्या नतीजा हुआ, यह सदन को बताना चाहिए।

The discussion is not for the sake of discussion. Why has this issue been raised time and again on the floor of this House? It is because this is a major problem that the country is facing today. The amount of black money is equal to more than two years’ budget allocation. People are dying of starvation and farmers are committing suicide. किसान आत्महत्या कर रहे हैं, खुदकुशी कर रहे हैं। There is no money for them whereas the Governments are changing the laws or amending the laws and are allowing people to do all this. By pursuing new liberal policies they have facilitated proliferation of black money.

We have seen that the Government has received a list of the people who have deposited money in the Swiss Bank and banks in other countries in 2010. A list has been submitted to the Supreme Court. What prevents the Government to disclose the names? What prevents the Government to come out with the list not only to the House, but to the nation? The people are asking for it. Our national asset is being looted.

Just now Sharadji has referred as to how natural resources are being plundered or looted. We have seen how iron ore was looted in Karnataka and other States. One family has amassed a huge wealth within five years. The total asset reached to Rs.35000 crore. I worked out and found that the per-day income comes to Rs.25 crore! Just imagine that during the last five years how much wealth a particular family in the State of Karnataka has amassed. How could this be done?

How have our laws been allowed to be violated? यह उल्लंघन हो रहा है। हमारे देश के कानून का उल्लंघन करके विदेश में पैसा जमा कर रखा है।

Sir, we have seen Hasan Ali Khan’s case -- which was referred to by Advaniji -- and his aide Kashinath Tapuriah, who is from Kolkata. His house was raided in Pune, documents were seized, and the Enforcement Department found that Rs. 35,000 crore was deposited in LSB Bank. How much tax has been evaded? In the case of Hasan Ali Khan, it was Rs. 50,000 crore and in case of Kashinath Tapuriah, it was Rs. 20,000 crore. Together, Rs. 70,000 crore was the tax evasion. After the Supreme Court’s intervention only, they were seriously interrogated. Prior to that, there was no serious interrogation of either Hasan Ali Khan or Kashinath Tapuriah.

How can we prevent the proliferation of this black money? We have Double Taxation Avoidance Agreements with a dozen countries. We have Double Taxation Avoidance Agreement with Mauritius, which is a small Island. From April, 2000 to April, 2011, how much was the FDI inflow? The total FDI during this period was Rs. 5.42 lakh crore. How much of it was from Mauritius? It was Rs. 2.62 lakh crore. Within 11 years, Rs. 2.62 lakh crore was routed from Mauritius, which is a small country. Within 11 years, the Foreign Direct Investment (FDI) which we have in our country from Mauritius was 41 per cent. Whose money was that? That was Indian money routed through Mauritius, as we have Double Taxation Avoidance Agreement with Mauritius. This question was raised a number of times on the floor of the House.

During the UPA-I Government when the Left Parties used to extend external support, we put pressure on the Government, and some steps were taken. But later on we did not find any result. So, if you have Double Taxation Avoidance Agreements with certain countries, particularly Mauritius, where a number of companies have their Registered Offices in order to avoid taxes, then where has this money gone? This money has gone to foreign banks. Unless the Government takes certain concrete steps, it will not be possible to control, contain and prevent black money.

I would like to put a few questions to the Government. The Government has been signing Tax Information Exchange Agreements with various tax havens like Bahamas, Bermuda, British Virgin Islands and Cayman Islands. Has the IT Department received any concrete information in regard to Indian tax evaders under DTAA? How many requests have been made by CBDT so far and how many responses have been received? Has the Government received any concrete information from Switzerland under newly singed DTAA regarding bank accounts held by Indian?

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

SHRI BASU DEB ACHARIA : If the Government has not received the information, what are the obstacles? The Government should tell us. Mauritius is the biggest conduit for channelising illegal money into India from abroad.

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।

SHRI BASU DEB ACHARIA : I have three more questions to ask this Government. Has any step been initiated to chase DTAA with Mauritius? If it has not been done, then why it has not done? It has been reported that last year, the French Government has handed over a list of 700 Indian accounts held in HSBC. Government received a list of 700 persons.

उपाध्यक्ष महोदय : आप सीधे सवाल पूछिए, आप तो विश्लेषण करते हैं।

SHRI BASU DEB ACHARIA : If Government has received, if it is true, why has the list not been made public? What prevents the Government to disclose the list to the House and the people of the country?

Sir, what is the progress so far made in quantifying the amount of black money held by Indians in off-shore bank accounts? 462 billion dollars Indian black money is lying in the foreign banks.

I have one more question. What steps the Government has taken to quantify the black money lying in the foreign banks? Black money is not only lying in the foreign banks but also in the country. How many persons have been prosecuted so far? We are told that the Government could recover 24 crore. This is nothing. How many persons have been prosecuted so far under the Prevention of Money Laundering Act? Why is this conviction rate so low?

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।

SHRI BASU DEB ACHARIA : I have another important point Sir. The black money is also misused during the elections. So, we will have to take a number of steps. There is a need to have electoral reforms to prevent the use of black money in the elections. For that, what is required is state funding of elections. The Government should seriously consider the state funding of elections to prevent the misuse of black money during the elections.





SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Mr. Deputy Speaker, Sir. I stand here to participate in the discussion of Adjournment Motion that has been moved by revered leader Shri Lal Krishna Advani Ji today in this House.

Before delving into the main issue, I would like to mention here that the term ‘black money’ has been interpreted throughout the country and has undergone a number of changes. Very recently, especially after Shri Barack Obama has become the President of United States of America, the term ‘black’ has become misnomer or rather it has become very offending to include that in illicit money. So, therefore, they have tried to distinguish between black and grey. What is black money? The black money is the money that is being generated, illegally of course, but relating basically to narcotics trade and illegal arms trade. In that respect, the G-20 Conference which was held in Canada some years back had categorically stated that this should be looked into . It should be across the border and every nation should try to curb that amount of money that is being transacted across the border. Then what is grey money? The grey money that they have been interpreting is the money that is illegally transacted which needs to be taxed and which can come back to the origin where that income has actually generated. Black money is generally used to denote unaccounted money or concealed money or undisclosed wealth as well as money that is involved in transactions wholly or partly suppressed. Black money, therefore, has been divided in two broad categories . The first category is the money which is black from the moment it is earned because it is earned from an illegal activity. Bribes of all sorts, foreign exchange fiddles, smuggling, under-invoicing and over-invoicing, gambling and the like, all these constitute and result in black money category. The second one is the money which initially is earned from perfectly legal and legitimate activities but which become s black simply because income earner conceals this income in order to evade taxes in it.

Decades ago, Chakrav arti Rajagopala chari spoke about the need to rescue Indian democracy from money power and ever since then , every Government has talked about it doing very little to do away with this scourge. Black money is not the preserve of the rich and the powerful. It is also generated every time a bribe is paid and income is not disclosed. Prof. Nic holas Calder the eminent British Economist first estimated the black money in India during 1953-54 and had put it at Rs.600 crore, that is, six per cent of the National Income of that time. The Wanchoo Committee of 1971 pegged it at Rs.7,000 crore and by 1983-84, black money accounted for as much as 18 per cent of India’s Gross Domestic Product. Dr. Raja C helliah revised the figures upwards to 21 per cent of GDP. The Wanchoo Committee put down the causes of the creation of black money and its proliferation to high rates of direct taxation, e conomy of shortage and consequent controls and licenses, donations to political parties, corrupt business practices, high rates of sales t ax and other devices, ineffective enforcement of tax laws and deterioration of moral standards. It is being said that in our economy, at the moment, legitimate income has as much currency as illegal income. Our concern today is that a large part of this illicit money is transferred from India to foreign countries or vice versa through clandestine channels. The situation becom es more ominous when in spite of the claim on the part of the Government to recover black money stashed abroad, its action belies its words. Black income is a well-known and unfortunate reality of Indian economy. Yet the accurate estimates of black money and income remain elusive despite numerous studies conducted by economists since the early 1950s. We do not know how much of black money is in circulation within the country and amounts siphoned off to foreign bank accounts and other tax havens.

In this background, the claims like a sum of Rs.1500 billion US dollars, which will be in today’s calculation around Rs.7000,000 crore, Indian money is sitting in Swiss bank accounts alone, which if brought back to our country is enough to pay Rs.1 lakh to every poor person in the country, are really very amusing to hear. Naivety of these claims and the people making them notwithstanding, even the apex court seems to have got influenced by amateur claims.

The magnitude of illegality in the economy is huge. Even if we go by the lowest of the estimates, the magnitude is confounding. At least Rs.35,92,344 crore of black income is going to be generated during this current year. Similarly, the mount of money stashed away in tax havens and shell companies overseas is at least Rs.20,79,000 crore. This figure is a gross under-estimate of the total illicit outflows because it does not include funds transferred through illegal activities like havala, smuggling, drug trafficking, on which data is not available.

Black income is that part of the income which should be reported to the tax authorities but is not including the earnings from the illegal activities. This income, if unearthed and taxed can generate additional tax income of Rs.7,18,469 crore. But the problem is the people who can curb the illegal economy are also its beneficiaries. So, is it really surprising that black income continues to grow bigger with each passing year?

A current study by Global Financial Integrity, a research and advocacy organisation working to curtail illicit financial flows out of developing countries, has taken the debate to a new height, to a new level. It has estimated the present value of illicit money outflow from India to be 462 billion US dollars. Why does the Income Tax Department simply not book the alleged evaders? I am informed that the Tax Department is not in a position to verify the list of HSBC Bank in Switzerland as the information was stolen.

We are reminded of Double Taxation Avoidance Agreement (DTAA) which has to mitigate the hardship caused by dual taxation on the same source of income. The DTAA also has a clause to check tax evasion. But this was never fully implemented. Why it has not been done I fail to understand. If the Government is serious about tracking black-money and plugging the illicit inflows, the international climate could not have been more propitious. The campaign was started by Organization for Economic Cooperation and Development, OECD, for transparency in the international banking system and making the tax havens to necessarily exchange information.

Recently, the G-20 held a Conference in France, where the Prime Minister of India made a strong pitch for ending banking secrecy so that tax evasion and outflow of illicit funds which has seen the migration of tax bases in developing countries could end. I am of the opinion that India needs to change domestic laws as well so that it can tackle black-money. The GFI findings reveal that only 27.8 per cent of India’s illicit assets are held domestically and de-regulation and trade liberalization in the 1991-period has accelerated the outflow of illicit money from Indian economy.

We have also entered into Tax Information Exchange Agreements, which have become effective after G-20 initiated the action. It is said that already 21 treaties have been signed out of which 14 with whom we have Direct Tax Avoidance Agreement. Will the treaties and agreements entered into by the Government for information exchange ensure retrieval and recovery of funds? We would like to get an answer from the Government. Or will it simply reduce to protocol, because of internal secrecy clause of Swiss bank?

Before I conclude, I have certain suggestions to make. There is a need to curtail trade mispricing, a widely utilized tax avoidance technique of international businesses. There is also a need to automatic cross-border exchange of tax information on personal and business accounts. These are certain steps which the Government should actively consider. The basic impression in the country today is that the Enforcement Directorate has become toothless because of Double Taxation Avoidance Agreement. No information is being passed on to the ED because of the agreements that we have entered into with 67 countries. I am also of the opinion, which part of the Government also has agreed, that there should not be any amnesty scheme, once you are aware of the illegal money that is stashed abroad. That should be the major step which the Government should take. A deterrent should also be created; a fear psychosis should also be created amongst the culprits who are indulging in tax evasion and stashing money abroad.

Let us not repeat what Rajaji had said some 60 years – it will not give any result unless we take concrete steps.



उपाध्यक्ष महोदय: मेरा अनुरोध है कि वक्तागण संक्षेप में बोलें तो अच्छा होगा क्योंकि बोलने वाले काफी लोग हैं। चार बजे मंत्री जी का जवाब है।

श्री लालू प्रसाद (सारण): आसन को थोड़ा कड़ा रहना चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय : कितना कड़ा रहें? कड़ा रहेंगे तो आप लोग ही कहेंगे कि अभी तो डांट रहे हैं।

श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़):उपाध्यक्ष महोदय, माननीय आडवाणी जी ने विदेशी बैंकों में जो भारतीयों का काला धन है, उस विषय पर चर्चा के लिए काम रोको प्रस्ताव सदन के सामने रखा है। उस प्रस्ताव का मैं समर्थन करता हूं और आडवाणी जी ने जो यहां पर बातें रखी हैं, उसमें कहीं भी उन्होंने सरकार की आलोचना नहीं की बल्कि यह कहने का प्रयास आडवाणी जी ने किया है कि जो विदेशी बैंकों में काला धन है, वह किस प्रकार से अपने देश में लाया जाए क्योंकि यह काला धन हमारे देश का एसैट है, हमारी सम्पत्ति है, इस देश की सम्पत्ति है और उसे किस प्रकार से यहां लाया जाए, न केवल आज यहां पर काम रोको प्रस्ताव उन्होंने यहां रखा है बल्कि इसके पूर्व 40 दिन की जन चेतना यात्रा पूरे भारत वर्ष की उन्होंने की औऱ आज पूरे देश में इस काले धन को लेकर जनता में आक्रोश है। जो आंकड़े सदन के सामने हर वक्ता की बातों से आए हैं, वे काफी चौंकाने वाले हैं। यदि सचमुच 25 लाख करोड़ रुपये हमारे भारतीयों का विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में हैं तो ये आंकड़े चौंका देने वाले हैं। ये हमारे सालाना बजट के तीन गुना हैं औऱ इतना काला धन विदेशी बैंकों में यदि भारतीयों का है और दुर्भाग्य से यह स्थिति हमारे देश की है कि हमारी सरकार को जो गरीबी रेखा के मापदंड हैं, वे मापडंद जब उन्होंने नये बनाये, तब शहरों में यदि 32 रुपये प्रतिदिन से ज्यादा आय किसी की है, तो वह गरीबी रेखा से ऊपर है। गांवों में 26 रुपया प्रतिदिन आय का मापदंड है और राज्यों में अलग अलग कानून हैं। विशेष रूप से जो मजदूरी करते हैं, उनके लिए मिनिमम वेजेज एक्ट जो राज्य सरकारों ने बनाये हैं। महाराष्ट्र की जानकारी मुझे है, महाराष्ट्र के मिनिमम वेजेज एक्ट के मुताबिक कम से कम 127 रुपये रोजाना मजदूरों को रोजगार मिलना चाहिए। जब यह मिनिमम वेजेज एक्ट बनाया गया तो इस बात की ओर ध्यान दिया गया है कि राज्य में यदि किसी को अपना जीवन यापन करना है तो उसे जीने के लिए कम से कम यानी न्यूनतम 127 रुपये रोज मिलने चाहिए औऱ तभी वह सही तौर से अपना जीवन यापन कर सकता है। इसका मतलब यह होता है कि 127 रुपये से कम पाने वाले जितने लोग हैं, वे सारे गरीबी रेखा के नीचे हैं। हमारा जो सरकारी आंकड़ा है, वह 38 प्रतिशत है लेकिन वास्तव में 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी जो गरीबी रेखा के नीचे हैं, हमारे यहां आज भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हमारे देश में आज भी लोग भुखमरी से मर रहे हैं। हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़ा कि जो अनाज गोदामों में पड़ा सड़ रहा है, वह मुफ्त दीजिए। यह हालत हमारे देश की है।

यह हालत हमारे देश की है। ऐसे देश के 25 लाख करोड़ विदेशों में कालेधन के रूप में पड़े हैं। जब आडवाणी जी का भाषण खत्म हो गया तो कांग्रेस की ओर से मनीष तिवारी जी बोलने के लिए खड़े हो गए। उस समय शत्रुघ्न सिन्हा जी यहां बैठे थे, उन्होंने बैठे-बैठे एक कमेंट दिया और कहा कि आडवाणी जी की बिरयानी के बाद यह करेले की सब्जी। ...( व्यवधान) वेजीटेरियन के लिए वैज थी और नॉन वैजीटेरियन के लिए नॉनवैज थी। ...( व्यवधान) मुझे सदन को उकसाना नहीं है। मैंने यह इस बात पर नहीं कहा है कि शत्रुघ्न सिन्हा जी ने कमेंट किया, मैं इस बात को इसलिए सदन के सामने रखना चाहता हूं कि यहां मनीष तिवारी जी ने जो जवाब दिया है, वे सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर यहां बोले हैं, यदि यह मानसिकता सरकार की होगी तो क्या यह कालाधान सचमुच वापस ला सकती है? चिंता की बात तो यह है कि क्या सचमुच सरकार यह चाहती है, सरकार की मंशा है कि जो कालाधन विदेशों में पड़ा है वह वापिस आ जाए? आज चर्चा यहां हो रही है, हमें केवल चर्चा का उत्तर नहीं चाहिए, केवल जवाब नहीं चाहिए, यह सदन चाहता है बल्कि तमाम देश की जनता चाहती है कि 25 लाख करोड़ या जो भी है, जो कालाधन विदेशों में पड़ा है, वह सारा धन वापिस आए। यह देश की जनता चाहती है और सदन भी चाहता है। इसके लिए सरकार क्या कारगर कदम उठाएगी? सरकार क्या करना चाहती है? सरकार किस प्रकार से उस कालेधन को वापिस लाना चाहती है? इस संदर्भ में सरकार की तरफ से जवाब आना आवश्यक है। हमें केवल चर्चा का उत्तर नहीं चाहिए। इसका जवाब आना आवश्यक है।

उपाध्यक्ष महोदय, यह आश्चर्य की बात है, अचरज की बात है कि जब आडवाणी जी बोल रहे थे तो बीच में फारुख अब्दुल्ला साहब खड़े हो गए। वे स्वयं सरकार में मंत्री हैं, जब फारुख अब्दुल्ला जी खड़े हो गए, उन्होंने अपने राज्य की चिंता सदन के सामने रखी और आडवाणी जी से कहा कि आप कालेधन के बारे में बोल रहे हैं, जम्मू-कश्मीर में आज जो आतंकवाद बढ़ रहा है या बढ़ाया जा रहा है, जो आतंकवादी गतिविधियां हो रही हैं, उन सबको हवाला के माध्यम से धन आ रहा है। ये तो और चौंका देने वाली बात है कि सरकार का एक मंत्री सदन में यह कह रहा है कि जो आतंकवाद वहां हो रहा है उसे हवाला के माध्यम से धन आ रहा है। सरकार क्या कर रही है? ...( व्यवधान) ये और चिंता का विषय है कि मंत्री यहां बता रहे हैं। सरकार के एक मंत्री बता रहे हैं कि हवाले के माध्यम से आतंकवादियों को वहां धन पहुंचाया जा रहा है। यदि सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि हवाला के माध्यम से आतंकवाद बढाया जा रहा है या आतंकवादियों को धन पहुंचाया जा रहा है तो अब सवाल यह उठता है कि सरकार इस संदर्भ में क्या कदम उठाएगी? सरकार इस संबंध में क्या कदम उठाना चाहती है? आज कालेधन की चर्चा दुनिया भर में है। मैं इस बात को इसलिए दोहरा रहा हूं क्योंकि चाहे 9/11 का वर्ल्ड ट्रेड सैंटर का हमला हो या 13/12 का संसद पर हमला हो, आज दुनिया में जहां भी आतंकवाद हो रहा है, सारे आतंकवादियों को समर्थन विदेशी देशों में पड़े कालेधन से दिया जा रहा है। अमरीका जैसी महासत्ता को कल तक अपने आप पर गरूर था, जो कभी सोच नहीं सकता था कि उन पर भी इस प्रकार का हमला हो सकता है लेकिन अमरीका पर भी हमला हो गया। आज अमरीका हिल गया है इसलिए वे सारे देशों की आतंकवाद के बारे में चर्चा कर रहा है। उन्होंने तब यूएन काउंसिल के माध्यम से दबाव बनाया, तब तक स्विट्जरलैंड सीक्रेसी के नाम पर हमारे काले धन को जमाए बैठे थे।



15.00 hrs.



हमारे लोगों के करोड़ों रुपये विदेशी बैंकों और विशेषकर स्विटजरलैंड के अलग-अलग बैंकों में जमा हैं। अब वह सीक्रेसी हट गई है। आज जब स्विटजरलैंड सरकार चाहे यू.एन. के दबाव के कारण हो या अन्य किसी कारण से हो, यदि वह इस बात को स्वीकार करती है कि यदि दुनिया का कोई भी देश हमसे मांग करता है तो ये सारी जानकारी हम उस देश को देने के लिए तैयार हैं। ऐसे में जिम्मेदारी अब हमारी सरकार की बनती है, भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती है।

महोदय, बीच में अखबारों और मीडिया में ये खबरें आई थीं कि तीन सांसद हैं, जो आज इस सदन के मैम्बर हैं और उनका काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। हम जानना चाहते हैं कि वे तीन सांसद कौन हैं, जिनकी चर्चा मीडिया में हो रही है? यह सरकार की जिम्मेदारी है कि यदि इन सांसदों का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है तो उन सांसदों का नाम उजागर करे।

उपाध्यक्ष जी, किनका काला धन वहां जमा है, उसकी सूची सरकार के पास है। ये काला धन किनका है, इसकी सूची केन्द्र सरकार को जारी करनी चाहिए। जिनका काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, वे हमारे देश के लिए अपराधी हैं और ऐसे अपराधियों की सूची सरकार को सदन के सामने और देश की जनता के सामने जाहिर करनी चाहिए। यहां सदन में जो चर्चा चल रही है, यह केवल चर्चा नहीं, बल्कि देश के तमाम लोगों की चिंता है। हमारे देश में बहुत गरीबी है और हम गरीबी उन्मूलन करना चाहते हैं। मैं समझता हूं कि जिस दिन यह काला धन वापस आयेगा, उस दिन इस देश से शत-प्रतिशत गरीबी का उन्मूलन हो जायेगा। इसलिए इस काम रोको प्रस्ताव का समर्थन करते हुए मैं सरकार से मांग करता हूं कि जितना भी काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, आप उसकी जानकारी विदेशी बैंकों से लें और वह काला धन जिन लोगों का है, उनकी सूची जाहिर करें और उनके खिलाफ कार्रवाई करें। यह काला धन हमारी राष्ट्रीय सम्पदा है, यह भारत की सम्पदा है, जिसे वापस लाकर सरकार राष्ट्र के विकास में लगाये।

आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

DR. M. THAMBIDURAI (KARUR): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I thank you very much for giving me an opportunity to participate in this discussion.



15.02 hrs.

(Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair)

We are discussing a very serious subject – black money and corruption. This is the topic which we have taken up for discussion. Most of the hon. Members who have expressed their views have vouched that there is black money in the country. Nobody has disputed that and because of black money, our whole economy has been jeopardized. The black money is the product of corruption. So, it is essential that we tackle both black money and corruption. There is enormous and rampant corruption every where in India. It is a real challenge before the country.

Sir, we alone are not discussing black money and even the common man of the country is speaking about black money. Much of black money is deposited in foreign countries. That is the view of the people. That is why, we are discussing this matter seriously. I am thankful to Advaniji and others who have taken up this issue for discussion. It is a very serious matter.

Massive corruption is prevalent in India and it is adversely affecting the people and their lives. In the recent past, the country has witnessed one of the biggest loots since Independence of India - the mega-2G scam. We also had other major scams like Adarsh Group Housing Society scam, CWG scam K.G. Scam and so many other scams.

Many hon. Members have asked why this black money is being generated. I think this is because of tax evasion. The taxation is heavy in our country which is why some people have deposited money in foreign countries to evade tax. The other important factor for black money is the real estate business. Many hon. Members have expressed concern about it. Most of the people have not only deposited in foreign countries, but the local people who are getting black money here itself are investing in real estate.



Even ordinary people, who are working in offices, are purchasing a plot of land. What is the rate? Take for example, if the value of the land is, say, Rs. One lakh, then the person is even willing to pay a sum of Rs. One crore to purchase that land. That is what is happening. That is why, recently, the value of land has increased enormously because people want to invest their money in real estate. It is the safest way of investing of black money. It is not just in tax havens that people keep their black money but in India people are investing their black money in real estate business because that not only becomes a safe investment but also over a period of time, the value of it increases as well.

Sir, in regard to hawala I would like to submit these hawala transactions are taking place not only from outside of India but even within the country. Take for example, someone wants to transfer a sum of Rs. 2 crore from Chennai to Delhi, then there are hawala people who could help get this money transferred in exchange of some commission amount and that is how the black money is getting circulated within the country.

Then there is the issue of the counterfeit notes. I have spoken about the issue of counterfeit notes many times before in this House. The counterfeit note circulation is prevalent within the country. This also is black money since it is not accounted for. Even printed Indian currency notes from foreign countries are also in circulation in this country and because of that, people cannot keep that money with them and so, they invest such money again either in real estate or in securities, etc. This is a very serious matter. My leader, the hon. Chief Minister of Tamil Nadu many times has issued statements that black money has to be unearthed and the money deposited in foreign countries must come back to our economy and the Government must try to see that this money is used for the development of the country.

Many hon. Members have mentioned about bringing back the black money deposited in foreign banks to our country. The Government has to make an effort in this direction. They have to find a way out for this. Hon. Finance Minister mentioned that because of the existing rules and regulations and treaties between countries, we are not in a position to get the list of the persons having accounts in the foreign banks. But there must be some other provisions also to get it. We have to persuade those countries, like Switzerland, Germany or France, wherever the monies have been deposited and get the money back into this country. France has released a list according to which there are 600 people from India who have accounts in banks of Switzerland. If France can get the list of people having such accounts in foreign banks, then why has India failed to get such a list? That is the worry. My request is that the Government must come forward to see that the black money deposited in foreign banks comes back to this country.

Nobody can correctly assess the extent of black money. Someone said it is rupee thirty thousand crore, Advaniji said it is Rs. 25,00,000 crore, Shri Mulayam Singhji said it is about Rs. 600 lakh crore or something like that. This amount, as we are given to understand, is about 40 per cent of our GDP. So much of money is lying outside this country. Once Shri Yashwant Sinha said there were people who were investing outside India, why can they not invest in this country? The Finance Minister promised that a time would come when people instead of going outside India would invest in this country. He promised to create such kind of an atmosphere in this country. I would like to request the hon. Finance Minister to come out with a White Paper on black money. He also has to assure the House that he proposes to bring, the black money deposited in foreign banks back to this country.

Sir, Apart from whatever law might prevent us, my request to the Finance Minister would be to try and reveal the names of the persons holding such accounts in foreign banks. Then only it will create confidence amongst the people of our country. The Parliament is the supreme body and the Government must make efforts to unearth black money and also bring that money back to India and use it for the development of the country and this is one of the ways through which we would be able to not only control inflation but also control price rise in the country.



MR. CHAIRMAN : Shri Nageswara Rao. You may complete your speech in 3 to 4 minutes only.



श्री नामा नागेश्वर राव (खम्माम):महोदय, आडवाणी जी के द्वारा आज ब्लैक मनी के बारे में जो एडजर्नमेंट मोशन लाया गया है, हम उसका पूरा समर्थन करते हैं। ब्लैक मनी देश के अन्दर भी है और ब्लैक मनी देश के बाहर भी है। इसे कैसे कंट्रोल करना है, इसकी जिम्मेदारी सरकार की है। इसमें सिस्टम के लूप होल्स हैं, गवर्नमेंट को इसे प्लग करना चाहिए। मनीष तिवारी जी ने जब अपनी बात कही तो उन्होंने सिर्फ इसे प्रोटेक्ट करने की बात कही। किसी भी इश्यू पर अपोजिशन की तरफ से जो भी कान्सट्रैक्टिव सजेशंस आते हैं तो सरकार के सभी मेंबर्स को उसे राइट-वे में लेना चाहिए, सिर्फ फाइट करने के मूड में नहीं रहना चाहिए। अभी जिस तरह से मनीष तिवारी जी बोल रहे थे कि एनडीए के समय में बहुत कुछ हुआ, यह सब क्या है? देश में आजादी के बाद पहली बार वर्ष 1955 में ब्लैक मनी की बात हुई थी, उस समय बोला गया था कि जीडीपी की ग्रोथ में 4.5 परसेंट ब्लैक मनी है। इसके बाद लगातार यह फिगर इन्क्रीज होती गयी। वर्ष 1969 में जस्टिस वॉन-चुंग कमेटी ने इसे 18 परसेंट बताया, इसके बाद नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ने बोला है कि जीडीपी ग्रोथ की 20 परसेंट ब्लैक मनी है। एस.पी.गुप्ता जी ने वर्ष 1992 में 42 परसेंट बताया। अरूण कुमार जी ने बोला है कि यह 50 परसेंट से ज्यादा है। एक्चुअल फैक्ट यह है कि अभी देश में जीडीपी की जितनी ग्रोथ है, उससे ज्यादा परसेंटेज ब्लैक मनी है। इसे कैसे कंट्रोल करना है, इसके लिए सरकार को जिम्मेदार होना चाहिए।

अभी अगर देखें तो हाल ही में जो एस्टीमेट आया है, ऑलमोस्ट 72,000 करोड़ ब्लैक मनी विदेश में है। उस ब्लैक मनी को देश में कैसे लाना है, यह सरकार को देखना चाहिए। अगर विद इन इंडिया का ब्लैक मनी देखें तो वह पूरा मैक्सिमम रिएल स्टेट के बिजनेस में लगा है। क्या यह हम सब लोगों को मालूम नहीं है? जितने भी माननीय सदस्य यहां बैठे हैं, सभी को इस बारे में मालूम है, सरकार को भी इस बारे में मालूम है। आज के दिन इंडिया के किसी भी सिटी में अगर प्रॉपर्टी परचेज करने के लिए जाते हैं तो पहली बात यही सुनने को मिलती है कि आपके पास चेक पेमेंट कितना है, कैश पेमेंट कितना है, 40-60 या 50-50। सिस्टम में यह सब कुछ मालूम होने के बाद भी इसे क्यों प्लग नहीं कर पा रहे हैं, उनको अरेस्ट क्यों नहीं कर पा रहे हैं? केवल इतना ही नहीं, अभी पॉलीटिकल करप्शन की वजह से भी ब्लैक मनी काफी बढ़ गया है। अभी फाइनेंशियल रिफॉर्म्स की वजह से कंट्री में स्कैम्स के बाद स्कैम्स आये, उसकी वजह से भी ब्लैक मनी काफी बढ़ गयी है। जब उन लोगों के पास ब्लैक मनी आया तो वे उसे देश के अन्दर नहीं तो देश के बाहर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। अभी हाल ही में देखें तो कितने स्कैम्स सामने आये, 2जी स्कैम आया, कॉमनवेल्थ गेम का स्कैम आया। आंध्र प्रदेश में एक स्कैम था, महोदय, राजा ऑफ दी करप्शन, एक आदमी ने एक लाख करोड़ रूपये का करप्शन किया। इसे हम लोगों ने पूरी डिटेल के साथ उस समय दिया था। उस समय सरकार यही सोचती थी कि हम लोग अपोजिशन में है, उसी की वजह से उसने इसके ऊपर कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन अब यह सब बाहर आ रहा है। इसी तरह से माइनिंग माफिया थ्रेट टू दी डैमोक्रेसी बोलकर हम लोग हाउस में इस बुक को लेकर आये। उस समय भी हम लोगों ने बोला कि यह थ्रेट टू दी डैमोक्रेसी है, माइनिंग माफिया डैमोक्रेसी को किसी तरह से खत्म करेंगे। कर्नाटक में हो, आंध्र प्रदेश में हो या पूरे देश में हो, इसके बारे में हम लोगों ने बात की है। उस समय भी गवर्नमेंट ने हमारी बात को गंभीरता से नहीं लिया। अब इस तरह से स्कैम्स के बाद स्कैम्स होने की वजह से यह सब प्रॉब्लम हो रही है। इस सबको कंट्रोल करने की जिम्मेदारी सरकार की है।

हमारा सुझाव यही है कि जब तक आप इसे कंट्रोल नहीं कर पायेंगे, तब तक देश का डेवलपमेंट नहीं हो पायेगा। छः लाख गांवों में आज के दिन पीने के लिए पानी नहीं है, सड़कें नहीं है, एजुकेशन की समस्या है और ड्रिंकिंग वाटर की प्रॉब्लम है। इन सब प्रॉब्लम्स को समाप्त करने के लिए सबसे पहले तो ब्लैक मनी को अरेस्ट करना चाहिए। इस सबके लिए गवर्नमेंट को सबसे सजेशन लेना चाहिए। अभी इमीडिएटली इलैक्टोरल रिफॉर्म्स होना चाहिए। जब चुनाव आते हैं तो सब लोग दिल से सोचते हैं कि हम लोगों के पास कोई पैसा लेकर आए, तो हम लोग लेते हैं। वे उस पैसे को कहां से लायेंगे, वह भी तो ब्लैक मनी है। यह बात सही नहीं है क्या? इसलिए इलैक्टोरल रिफॉर्म्स होना चाहिए और उसका फाइनेंशियल रिफॉर्म्स भी होना चाहिए। इस सिस्टम को ट्रंसपेंरेंट बनाना चाहिए। टैक्सेज की वजह से, सिस्टम की वजह से रियल बिजनेस करने वालों के मन में यह नहीं आना चाहिए कि हम किस तरह से टैक्स को एवाइड करें। सिस्टम फेल्योर की वजह से यह सब हो रहा है। हमें उम्मीद है कि वित्त मंत्री जी इसको गंभीरता से लेंगे। वे ज़रूर इस संबंध में कुछ करेंगे। हमें सरकार से भी उम्मीद है। इस चर्चा के बाद देश के लोगों को ब्लैक मनी और करप्शन के संबंध में बताने की ज़िम्मेदारी सरकार पर है और सबसे ज्यादा वित्त मंत्री पर है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं उम्मीद करता हूँ कि इसका ज़रूर रिज़ल्ट आएगा और इस एडजर्नमैंट मोशन का सपोर्ट करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।



SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Mr. Chairman, thank you. At the very outset I must thank the revered leader, Shri L.K. Advani for bringing this matter for discussion in this House through the Adjournment Motion. I support the Motion.

The menace of black money has now reached such a staggering proportion that it is causing havoc to the economy of our country and it poses a serious threat. This is not only the question of illegal and unaccounted money deposited or stashed away abroad or deposited in foreign banks or in any tax havens, but it is also the question of black money generated internally. It was told earlier that black money is a parallel economy. But the present situation is that it is not a parallel economy. In fact, it is a dominating factor in our Indian economy.

It is rightly said by several Members and I too agree with them that black money has two categories. One category is the money earned through illegal activities, such as bribes, smuggling, under and over invoicing, gambling, etc. The other category being the money earned through legal and legitimate activities but the concealed in order to avoid paying taxes. Whatever it may be, black is black.

What is the magnitude and volume of black money now? According to a study conducted in 1953 by noted economist Nicholas Kaldor, it was 4.5 per cent of the GDP. In terms of rupee, it was roughly Rs. 600 crore. According to a study conducted by Shri Arun Kumar in 2005-06, it was 50 per cent of the GDP. In terms of rupee, it is Rs. 39 lakh crore. Ten per cent has gone out of the country through different channels, such as hawala, under and over invoicing, etc. Since 1971, the higher tax rate has declined from 97.50 per cent to 30 per cent. But the black money grew from seven per cent of the GDP in 1971 to fifty per cent in 2010.

Shri Advani rightly referred to The Global Financial Integrity and its findings. What are its main findings? Mr. Chairman, please allow me to refer to them. One is, India lost 460 billion dollars through illicit flow; secondly, India’s black money is estimated at 50 per cent of its GDP or about 640 billion dollars, and in terms of rupee it will not be less than Rs. 30 lakh crore. So, the bulk of India’s black money is stashed away in secret accounts of Switzerland.

According to the data provided by the Swiss Bank, India has more black money than rest of the world combined. It is very much embarrassing. When more than 40 lakh people are languishing below the poverty line and when Shri Arjun Sengupta’s Report is that more than 78 per cent population of our country have not even more than Rs. 20/- per day for expenditure, huge black and illegal money has been stashed away and it has been deposited in the banks including the foreign banks.

Sir every year the black money is increasing in rapid speed. This is the situation. So, it is not clear as to why our Government is so reluctant and why the Supreme Court called that the Government is not so serious. The Supreme Court further says that the Government should come out with the list about the black money holders in the Swiss Banks. … (Interruptions) Sir, please allow me two more minutes.

MR. CHAIRMAN : No, you have to conclude within one minute.

SHRI PRABODH PANDA : The question is what are the routes of black money? They are smuggling of gold, diamond and luxury articles, unauthorized foreign currency dealings, speculations, purchases of industrial spaces (real estates), donations to political parties and financing in elections, under-invoicing and over-invoicing of exports and imports, kick backs from major defence dealings, transactions done abroad and transactions through hawala, and all these things. So, we should not approach the black money issue in other way, but we have to comprehensively plug all the resources. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please wind up.

SHRI PRABODH PANDA : Sir I am coming to my concluding part. First, declare the names of account holders in Swiss Banks or other banks or in other tax havens, start criminal cases against them, put them behind the bar, and confiscate their illegal money. Now, the Supreme Court has constituted the SIT. If the SIT is serious about eradicating the menace, they should target the corrupt practices, particularly in the reality sector which is the mother source of black money.

Sir, my last point is that as far as the illegal outflow of funds is concerned, it is crucial to identify who is the ultimate beneficiary. He should not be left out. We should take into consideration that who is the ultimate beneficiary of this illegal process. So, all these things should be taken into account and the Government should take the bold stand on this issue. This is not the problem of the Government of the day. I am not blaming the Government of the day but all the successive Governments have failed to take action on this issue.

Sir, with these few words, I conclude my speech.





श्री लालू प्रसाद (सारण): महोदय, माननीय आडवाणी जी ने देश के गांव, खेत-खलिहान और सभी जगह काले धन, स्विस बैंक के मामले में बहुत ही सही समय पर इन्होंने एडजर्नमेंट मोशन दिया है। जिसमें यह आग्रह किया है कि जिन लोगों का विदेश में काला धन जमा है, उनका नाम उजागर होना चाहिए। यह बहुत अच्छा काम आपने किया। इसलिए आपने अच्छा काम किया, क्योंकि हम राजनीति में लगे हुए लोग, अलग-अलग पार्टी में लगे हुए लोग, विभिन्न विचारधाराओं के लोग, जो बैठे हुए हैं। हम एक-दूसरे को ब्लैम कर रहे हैं, गाली दे रहे हैं और जाली कागजात भी रिलीज़ कर रहे हैं कि अमुक-अमुक दल के नेताओं का इतना पैसा विदेशों में जमा है। ...( व्यवधान) मेरे विषय में भी लिखा गया है कि 30000 करोड़ जमा है। मेरे नाम लेने से आप लोगों को तक़लीफ होगी। आडवाणी जी, मैं आपको बाद में कान में बता दूंगा। इस काले धन और स्विस बैंक के मामले को सभी तरह के लोग, सभी पक्ष के लोग समय-समय पर उठाते रहे हैं। प्रणब बाबू उधर जा रहे हैं।

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): I am here only.… (Interruptions)

श्री लालू प्रसाद : हम लोगों ने सरकार को समय-समय पर आगाह किया कि अगर पैसा वापस कराने में, नाम लाने में विलम्ब कीजिएगा, तो लोग फिर पैसा वापस भी कर लेंगे। लोग एलर्ट रहते हैं। जो नेता लोग बोल रहे हैं, हम लोग बोल रहे हैं, सब अलग-अलग ढंग से अनुमान लगा रहे हैं। हम लोग खुद कन्फ्यूज्ड हैं और केवल अंदाज़ पर काम कर रहे हैं। हो सकता है कि नेताओं को जानकारी होगी कि किनका कितना पैसा स्विस बैंक में जमा है। समय-समय पर सरकार का उत्तर आया कि उसमें कठिनाई है, इंटरनेशनल ट्रीटी है, इसलिए हमें नाम बताने में दिक्कत हो रही है। लेकिन देश ने देखा और हम सभी लोगों ने देखा कि इसी सवाल पर अन्ना जी और रामदेव जी का आंदोलन हुआ। इसमें हम सभी दलों के नेताओं के प्रति घृणा पैदा की गयी। लोगों ने क्या-क्या नहीं बोला? कहा गया कि इन लोगों को फांसी दे दो, ये लोग चोर हैं। हर एक पक्ष के हमारे कई नेता जन्तर-मन्तर पर गए थे। बहस की जगह यह है, हम इस पर अविश्वास करके सड़क पर चले गए। अन्ना जी सरीखे बुज़ुर्ग नेता ने कहा कि चोर से डर नहीं है, इन पहरेदारों से डर है। यह बात बहुत गलत है कि देश में घृणा पैदा की जा रही है। मुझे लगता है कि निश्चित रूप से देश में कहीं-न-कहीं रिवोल्ट कराने की तैयारी है और राजनीतिक सिस्टम को ध्वस्त करने का षडय़ंत्र है। वे कहते हैं कि डेमोक्रेसी, पार्लियामेंट पर हमें विश्वास नहीं है। इसलिए प्रणब बाबू से आग्रह है कि आप बताएं, आपको उजागर करना करना चाहिए कि वे कौन लोग हैं। अगर वे नेता हैं तो बताएंगे कि कहां से धन लाए, व्यवसायी है तो बताएगा कि कहां से धन लाया। अगर कोई व्यवसायी या एन.जी.ओ. ने किसी का धन लेकर जमा किया, तो वह बताएगा कि वह धन कहां से लाया। यह साफ हो जाना चाहिए। अभी चुनाव भी आने वाला है, पार्लियामेंट का चुनाव है। हर आदमी एक-दूसरे का पर्चा छापकर बांटेगा कि किसका कितना पैसा बैंक में जमा है, कौन सा खाता है? यह सब कौन देखने जाता है? इसलिए सरकार से आग्रह है कि डर किस बात का? आप लिस्ट को रिलीज कर दीजिए। इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। इन्हीं चीजों को लेकर देश में राजनेताओं के ऊपर, हमारे संविधान और संसद के ऊपर रोज उंगली उठायी जा रही है। यह कहा जा रहा है कि संसद में 180 क्रिमिनल बैठे हुए हैं। यह अन्ना जी का बयान है। हम लोग हर तरह से उनका आदर करते हैं। कौन भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं है, कौन नहीं चाहता है कि स्विस बैंक से पैसा आए? यह सरकार को साफ-साफ बताना चाहिए। यह रिलीज कर देना चाहिए। रिलीज करने के बाद पैसा कैसे लाना है, उसको लाने के लिए क्या प्रोसेस है, उस पर टैक्स लादना है या एक्सप्लेनेशन लेना है, यह बताइए। इसीलिए हमने कहा कि हम गरीबी और भ्रष्टाचार की बात करते हैं, भाषण देते हैं, आप यह कानून क्यों नहीं बना देते हैं कि जिनका भी काला धन, ज्यादा पैसा, ज्यादा जमीन और जिसके कई फ्लेट हैं, उसकी सारी प्रोपर्टी को सरकार टेक-ओवर करे, भ्रष्टाचार मिटना चाहिए। सारी प्रोपर्टी एक बार टेक-ओवर करिए और उसका डिस्ट्रीब्यूशन करिए। जिन्हें जरूरत है, उन्हें दीजिए। तब गरीबी मिटेगी और समतामूलक समाज आएगा। तब फिर आगे कोई चोरी करने की हिम्मत नहीं करेगा, लेकिन यह बात लोगों को मंजूर नहीं है। मैंने बार-बार कहा कि हम यह बात करते हैं कि धन और धरती बंट कर रहेगी, लेकिन जब बांटने का सवाल आता है तो हम भूल जाते हैं, छोड़ देते हैं कि अपना-अपना छोड़ करके होगा। बड़ी मुश्किल से लोग एमएलए और एमपी बन कर आते हैं, बहुत मुश्किल से लोग चुन कर आते हैं, इस बात को आप लोग भी जानते हैं। इसलिए लोगों को गाली न दिलवाई जाए, गाली नहीं सुनी जाए। आपको भी इस बात का पता है। सरकार इस समस्या से दबती है, इसलिए हम लोगों का सुझाव है कि उन लोगों का नाम प्रकाशित करना चाहिए। आडवाणी जी के पास अगर कोई नाम हो या अन्य किसी के पास कोई नाम हो, किसी का नाम छूटता हो तो वह नाम भेज दीजिए। हम देख रहे हैं कि जब यह सवाल उठता है तो ये चाहते हैं कि हम उसका नाम पब्लिश करें, लेकिन पता नहीं कि ये कैसे चूक जाते हैं और तब इनको गुस्सा आता है। प्रणब बाबू, आप गुस्सा मत करिए। इतिहास आपको याद करेगा, आप इस बात को छपवाएं, आप निकालिए कि किस-किस का है। मैं जानता हूं, हम लोग भी इधर-उधर घूमते रहते हैं। हम जो एक-दूसरे को गाली दे रहे हैं, एक-दूसरे को चोर कह रहे हैं कि ये चोर है, ये चोर है। ये करप्ट है, ये खा गया। हमें पता है कि सभी दलों के नेताओं का, हमें जो जानकारी है, वहां नेता नहीं है, ये बड़े-बड़े लोग कौन है, जिनके पैसे और अकाउंट वहां जमा हैं, ये प्रकाशित कराइए। इसे कृपा पूर्वक प्रकाशित कराइए। सरकार बदली, आपको मालूम है कि बोफोर्स का सवाल स्वर्गीय श्री वी.पी. सिंह जी ने उठाया था, हम लोग नहीं समझ पाते थे कि क्या हुआ, नहीं हुआ, सरकार चली गई। आपकी सरकार चली गई, इमर्जेंसी आई। आप इसे प्रकाशित नहीं कर रहे हैं और इनको तकलीफ दे रहे हैं। आप आडवाणी जी को क्यों तकलीफ दे रहे हैं? आडवाणी जी को उस समय देश भर में घूमना पड़ा। चारों तरफ जनता के बीच में जाना पड़ा और इनके मंच पर कोई माफिया आकर खड़ा हो गया। ये करीब सात हजार किलोमीटर घूमे, ये बुजुर्ग आदमी हैं। हमारी शुगर तो बार्डर लाइन पर है, पता नहीं इनका शुगर लेवल कितना है। ...( व्यवधान) ये घूमे, इनका दायित्व है। ...( व्यवधान)

आप भी इसमें नहीं बच रहे हैं, कोई नहीं बच रहा है। इसलिए आप आसन से डायरेक्शन दीजिए कि अब इसे टाला नहीं जाएं। सारे लोगों की सम्पत्ति को जब्त करिए ताकि आगे से ऐसा न हो। आप इस पैसे को डिस्ट्रीब्यूट करिए, हम छीनने के लिए नहीं कहते हैं, जितनी जरूरत है, आखिर कितना कौन धन रखेगा, इस चीज का अपने देश में इंतजाम करिए। हम अंदाजे से बोलते जा रहे हैं कि वहां से धन आ जाएगा तो हमारे देश की गरीबी मिट जाएगी। हम कहां-कहां सब्जबाग दिखा रहे हैं। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय, आपके माध्यम से मेरा प्रणब बाबू से आग्रह है कि आप इसे सुविधा के अनुसार गंभीरता से लीजिए, इसे टॉक आउट मत कराइए। आप तय कर लीजिए कि आप अमुक तारीख को या आज उस लिस्ट को पढ़ कर सुना दीजिए।...( व्यवधान) आज ही हो जाए, जो भी हो जाए। इस चीज को खत्म कराइए। राजनेताओं को ही सब गाली दे रहे हैं, कोई बचा नहीं है।

सब के खिलाफ हैट्रेड पैदा हो रहा है, इनको मारो, इन लोगों को फांसी दो, ये चोर हैं, ये सियासी गुंडे बैठे हुए हैं। हम लोग गुंडे हैं क्या? जो कभी यहां आने की सोच नहीं सकते, वही लोग यहां आने को बाहर छटपटा रहे हैं। लड़ाई आप लड़ रहे हैं और उधार वे लोग ले रहे हैं और हम मम होकर चुपचाप बैठे हुए हैं, डिमोरेलाइज़ होकर हम लोग यहां पर बैठे हैं। यह हमारी संसद सुप्रीम है, हमारा संविधान सुप्रीम है, हमारा विधान सुप्रीम है और सारी चीज़ को आप उठाइये और साफ-साफ मालूम हो जाये कि कौन आदमी है, आदमी क्या, जो लोग हैं, वहां धन है, वह धन का पता लगे। अगर आपको उसे लाने में कोई दिक्कत हो रही हो तो हम लोग राजस्थान से एक हजार ऊंट मंगवा देंगे, उस पर लाद कर लाया जायेगा। आप धन निकालिये और सारे धन का पता लगा है, आप लोगों को मालूम होगा, बेवजह आप लोग जलील होते रहते हैं, क्यों जलील हो रहे हैं, सांच को आंच क्या है। जो भी हैं, सारे नेताओं को, सब पर से शंका खत्म हो जायेगी और दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।

मैडम सोनिया जी इसमें बहुत सीरियस रहती हैं। इसलिए आपसे आग्रह है कि इसको आगे नहीं टाला जाये। मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं। आप सब का नाम प्रकाशित कर दीजिए, ताकि यह तमाम नेताओं के ऊपर जो क्लाउड है...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Laluji, you have taken enough time. Please conclude now. You cannot hijack the House.

श्री लालू प्रसाद : ...( व्यवधान) आप बात को समझिये।...( व्यवधान) हमारे विषय में लिख दिया, कांग्रेस के विषय में लिख दिया और जो बहुत मरहूम नेता हो गये, उनको भी बदनाम करने के लिए लिखा, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता हूं कि 30 हजार करोड़ रुपया लालू यादव का दिया है, लालू यादव का पैसा कहां है? इस पैसे को ले आओ, नहीं तो फिर झंझट आगे बढ़ेगा, इसलिए आप इसको प्रकाशित करिये, निकलवा दीजिए और निकलवा कर आगे फिर 1-1 सवाल आप लोग रोज़ किसी न किसी सवाल से दबे जा रहे हैं, दबे जा रहे हैं, दबे जा रहे हैं, इसे निकालिये, सारी बात को खोल करके बताइये। आडवाणी जी को क्यों तकलीफ आप लोग दे रहे हैं, आडवाणी जी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए। रथ यात्रा करते-करते आखिर इनकी भी उम्र है न, उम्र का ख्याल करना चाहिए।

हम इस आग्रह के साथ अपनी बात समाप्त करते हैं कि इसको आप रिलीज़ कर देंगे और सभी राजनेताओं को, सभी पार्टी के लोगों पर जितने भी लांछना है, चारों तरफ बाहर महान-महान ईमानदारों के द्वारा हैट्रेड पैदा किया जा रहा है, यह बात सामने आ जाये। मैं आपको धन्यवाद देता हूं। आप अच्छे आदमी हैं।



















SHRI SAMEER BHUJBAL (NASHIK): Mr. Chairman, Sir, first of all I would like to thank you for giving me this opportunity to participate in this very important discussion.

Sir, there is a lot of information available in the net about black money and sometimes they are printed in newspapers also. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, please maintain silence in the House.

SHRI SAMEER BHUJBAL : Sir, at various levels it has been said that so much of black money has been stashed away in foreign countries. There are various datas available and one of the data that I would like to bring to the notice of the House is that India is topping the list of various countries which have black money stashed abroad. It says that almost around 1,500 billion US dollars of Indian money has been illegally stashed away in foreign banks. In that list, Russia comes second, followed by the United Kingdom, Ukraine and China. This amount is 13 times larger than the nation’s foreign debt and still every year it is increasing. The total amount of black money is to the tune of 40 per cent of the GDP of India. It is believed that if all this money comes back to India, there will be a lot of development in the country. In view of growth, irrigation, slum development and a lot of projects may be generated.

Though it is true, the question is how do we get back the black money? It is very important to discuss it out and have a thorough policy that the black money, wherever it is kept, should be brought back to our country. No doubt, just because of the Supreme Court’s decision a Special Investigation Team was set up. The team was set up to see where the money stashed abroad in various banks. What happens to the ill-gotten gains hidden at home within the country, however, is anybody’s guess?

Black money is generated by the desire to evade taxes and hide assets disproportionate to known sources of income. Black money, after all, refers to the sum total of unaccounted income, and not just the funds spirited away to Switzerland, Lichtenstein or some other foreign safe heaven. I would urge that the Government must identify the legal and diplomatic tools the Government can use to find out this veil of secrecy. But unless it comes to grips with the overall pathology of black money, the political economy of India is likely to remain vulnerable to corruption.

Today, merely proceeding against unaccounted money, the Government must also push for urgent and far-reaching reforms in the way the Indian property market functions. Corruption in Government contracts and licensing may generate large individual chunks of black money but for sheer overall volume the top culprit is property.

Every day property transactions up and down the country add to the national stock of unaccounted money. Buyers and sellers collude in under-reporting the true value of the transactions. Usually, more than half the true sale price is paid in cash depriving the State of capital gains tax and stamp duty. The cash received is often recycled into the property market where the returns are extremely high. What this means is that the focus of public activism, political outrage and judicial concern on black money ought to be as much inward as it is westward.

Seizing the moment, the Government can and must devise a way to bring our wealth back from abroad. If it can also push for simple reforms in the property market to clean up transactions, it could make a huge contribution towards ending the problem of black money.





SHRI H.D. DEVEGOWDA (HASSAN): Mr. Chairman, Sir, I would like to participate in the Adjournment Motion moved by Shri Advani Ji. The House has given the consent unanimously and the hon. Speaker has given her consent after knowing the minds of the Ruling Party and the Opposition Parties.

Sir, the black money issue and the corruption issue were raised today by the seniormost Leader, who is elder than all of us, Shri Advani Ji. This issue is not concerned only with one Political Party; every Political Party today is concerned with corruption and black money.

Sir, I do not want to take the names of any individuals as I do not want to enter into those controversies. I would like to draw the attention of this entire House that one of the major issues is mines and land scam. The mines and lands are the major areas where the black money is generated.

Sir, with my experience as the Chief Minister of Karnataka and as the Prime Minister for a short while – with 13-Party coalition including Congress, I was the Prime Minister for 10 ½ months – I must compliment the Leader of the House, the UPA Chairperson and the Prime Minister who was responsible for introducing the New Economic Policy in 1991 because the country was in a debt trap. I know the situation. The gold was pledged during Chandra Shekhar’s period. During Narasimha Rao’s period also, the gold was pledged to save this country’s economic situation. Manmohan Singh ji is the Prime Minister today who is the author of the change of Economic Policy in 1991. To allow the foreign direct investors to come to India, he has given the first call for the foreign direct investors.

I would like to draw the attention of the hon. senior-most leader Advaniji, who gave the consent to Enron’s power project during their own period of 13 days when they were in office. Then what happened? Today, the Enron company chief is suffering in jail; the American court has given the verdict of life sentence. What happened to Satyam? I can quote a number of instances. I do not want to take the name of Harshad Mehta and others. In this very House, one of the senior-most Members of the Ruling Party, who is today not before us, Feroze Gandhi raised the issue of T.T. Krishnamachari. I can quote a number of instances here. I do not want to take the valuable time of the House. My Party was allotted time by your good self though I have not given any slip. I have sent the booklet titled ‘The Karnataka land and mine scandals put 2G to shame’ to all the Party leaders. This booklet was circulated to all the Party leaders including our Leader of the Opposition Sushma Swaraj ji. Today, the land scam and the mining scam have put all of us to shame. So, what steps were taken? Our Leader of the House has promised to bring the Land Acquisition Bill and the Congress General Secretary, the hon. Member of this House, the young man, Mr. Rahul Gandhi ji had gone to protest the Yamuna Expressway where the farmers are suffering. The former President of the Bharatiya Janata Party, Rajnath Singh ji is here. He also participated there and he went to jail. In Karnataka, with my own experience about the Bangalore-Mysore Infrastructure Corridor Project (BMICP), I have brought out everything in detail.

As a Member of this House, what is the role that we can play when things are going out of control? Please advise us as to what is the role that we can play. I have sent this booklet to every Political Party leader. Nothing has happened. On 19th of this month, before closure of this Session on 22nd – your good self has suggested one day’s extension of the House – you are going to bring the Lok Pal Bill or Jan Lok Pal Bill; I am not going to discuss on that issue.

I do not want to distinguish whether it is black money, or it is dirty money, or illicit money or drug money or terrorist money.









Sir, one of the issues which had been raised in this country against the then UF Government was the Voluntary Disclosure Scheme. The Chairman of the World Bank, James Wolfensohn came to India. At that time, myself, Shri P. Chidambaram and the then Cabinet Secretary were all there when we hosted a dinner to him. He just mentioned to us: “You are violating the IMF Agreement; You are violating the World Bank Agreement. We cannot fund India if you violate the Agreement.” At that time, I told him: “I am not going to accept whatever conditions that you have put. We are here to pay back your debts. You cannot force us. We are going to decide the areas of priority.”

Hon. Finance Minister, I would like to know how much money you are going to put for various schemes. I would also like to know as to where the accountability is. There are various Schemes like MPLADS, MGNREGA and schemes for urban infrastructure and rural infrastructure. I would like to know as to how much money you are going to give to the States under these schemes. Where is the accountability? You have given authorisation or permission to MPs to chair the meetings. What is that you can do?

I would only like to say why we had brought the Voluntary Disclosure Scheme. At that time, the hon. Finance Minister Shri P. Chidambaram was totally against that. He was not responsible. When I forced this issue, he told me: “You ask Jyoti babu whether he is going to agree.” At that time, I called the Hon. Finance Minister of West Bengal Government. After he went and discussed the issue with Jyoti Basu, he gave his permission. Then, I asked Shri Chidambaram to move the Voluntary Disclosure Scheme.

Sir, I do not want to give any colour to that. At that time, we had no money but we wanted to introduce the Public Distribution System. We had got Rs. 10,800 crore revenue. A sum of Rs. 33,000 crore and Rs. 35,000 crore was declared as black money at that time. That black money could be utilised for various other developmental activities. With this background I forced that issue. Otherwise was not the person to force that issue.

Today, the names of all the political parties or the names of MPs have been debated by the civil society. Now, they are asking for the Jan Lokpal Bill. I have no problem with that. Shri Advani, your goodself has suggested to all the Members of your party to file an affidavit. We are agreeable to that. We are ready to file an affidavit before the Election Commission, before the hon. Speaker or before anybody. Whatever affidavit you want, my Party is prepared to file that affidavit.

Sir, corruption issue is not there only today but it was there during the periods of Pandit Jawaharlal Nehru and Feroze Gandhi.

MR. CHAIRMAN: Please wind up. Other hon. Members are waiting to speak on the issue.

SHRI H.D. DEVEGOWDA : Sir, I know the time factor. I am also grateful to you, to the hon. Leader of the House and the hon. Parliamentary Affairs Minister to have allowed me to speak though I have not given my name. I was expecting that after Laluji, my name would be called. That was my expectation. Sir, my Party has got only three Members and I deserve to speak only three minutes. I might have crossed my time limit.

Please pardon me. I would like to express my thanks to the entire House.





श्री नृपेन्द्र नाथ राय (कूच बिहार): सभापति महोदय, आज माननीय आडवाणी जी ने काले धन के बारे में सदन ने जो एडजर्नमैंट मोशन दिया है, मैं उसका समर्थन करता हूं। मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा, क्योंकि सुबह से बहुत सारे सम्मानित सदस्यों ने इस बारे में चर्चा की है। मैं एनडीए और यूपीए, दोनों के बारे में टिप्पणी नहीं करूंगा, क्योंकि यह देश का मुद्दा है, सदन का मुद्दा है। सारा देश टीवी देख रहा है, क्योंकि आज सदन काले धन के बारे में चर्चा कर रहा है। इस बारे में हम कैसे दिशा निकालें।

सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि चुनाव के समय हर पार्टी का कोइ न कोई मुद्दा होता है। वर्ष 2009 के चुनाव में यूपीए टू का यह मुद्दा था कि हम सौ दिन में महंगाई कम कर देंगे। महंगाई कम हुई या बढ़ी, यह सारे सदन को मालूम है। उनके एजैंडा में यह भी था कि विदेशों में जितना भी काला धन है, उसे हम सौ दिन के अंदर वापिस ले आएंगे। आज दिसम्बर 14, 2011 है। कितने दिन गुजर गए? सात सौ से ज्यादा दिन हो गए। मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि भारत का काला धन किन-किन देशों में है। मैंने अब तक अखबारों में जो पढ़ा है, उससे यह जानकारी मिली है कि हमारी सरकार का काला धन लेने के बारे में 82 देशों के साथ समझौता हुआ था। लेकिन यह नहीं बताया गया कि किस-किस व्यक्ति का काला धन विदेश में है। उनके नाम सदन को बताने चाहिए, क्योंकि इसे देश की जनता जानना चाहती है। यह बहुत दुख की बात है कि काले धन के बारे में तीन सांसदों का नाम अखबारों में आया । हमें विदेश से ऐसी जानकारी मिली है। तीन सांसदों की वजह से सब सांसदों की बदनामी हो रही है। अभी आडवाणी जी ने कहा कि भाजपा के किसी भी माननीय सदस्य का काला धन विदेशों में नहीं है। इस बारे में हमने दस्तावेज दे दिए। यहां 543 सांसद हैं। हम सबको शपथ लेनी चाहिए कि हममें से किसी का भी काला धन विदेशों में नहीं है। देश की आजादी को साठ साल हो गए, लेकिन केन्द्र सरकार ने आज तक एक भी ऐसा कानून नहीं बनाया, जिससे काला धन बनाने वाले व्यक्ति को सजा हो। गरीबों का खून चूसा जाता है। बीपीएल कैटेगरी के लोगों को खाना नहीं मिलता, इसलिए वे मरते हैं। एक-दो प्रतिशत लोग देश के गरीब व्यक्ति का पैसा लूटकर काले धन के रूप में विदेश में भेजते हैं। वे विदेश में काला धन कैसे भेजते हैं? हमारा धन देश से बाहर कैसे जाता है, यह मैं माननीय वित्त मंत्री जी से जानना चाहता हूं। वे पंडित हैं, विद्वान हैं। मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा, लेकिन यह देश का सवाल है, पार्लियामैंट की पवित्रता का सवाल है, संसद का सवाल है। यह सबसे बड़ी पंचायत है। जो लोग धन लूटते हैं, उनके बारे में हमारी सरकार की क्या सोच है? अगर हमारी सोच ठीक होती, तो आज आजादी के साठ साल बाद अन्ना हजारे और बाबा रामदेव नहीं उठते। वे संसद का गौरव लूट रहे हैं। अन्ना हजारे बाहर लड़ेंगे तो लड़ेंगे, लेकिन हमारी जवाबदेही जनता पर है।...( व्यवधान) हम वोट से जीतकर आए हैं। जो लोग धन लूटते हैं, उनके लिए कानून बनाकर उन्हें सजा दी जाए। मेरी संसद से यही विनती है।



*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT): Respected Chairman Sir, black money, black market, control system, license system, all are the results of the World War II leadership of the country is well aware of the fallouts of these practices. After the independence of India, industries and factories were to be developed but we found that the same contract raj, license raj, quota system plagued the entire industrialization process and black money or ill-gotten money started to get accumulated. A large section of the wealthy persons in our country does not pay income tax but surprisingly, no action is taken against them. I am not talking about any particular political party but about all the parties who are and have been in power. Why don’t you think about the interest of the country first ? Why don’t you understand that development of the nation will lead to more and more prosperity of its citizens? If the people prosper, mass base of the parties will expand. Why don’t you realize this? In 1990-91, the policy of liberalization was adopted and the economy was opened up. It is often argued that foreign investment gives a boost to our GDP and growth prospects. Instead, we came across rampant corruption. The people in the administration, the corporate honchos and a part of the bureaucracy struck an unholy nexus among themselves and began to utilize the ill-gotten money for various illegal purposes. Tax evasion became easy, prices of essential commodities shot through the roof and all the money was stashed away in the Swiss Bank. Deliberately, the Indian banks were avoided to keep it away from tax scrutiny. I have only one question – we are independent, we have a Government in place. So can’t we take stringent measures, can’t we enact strong, effective laws to curb tax evasion? Can’t we punish the violators of law? We call ourselves sovereign ; we call the Parliament supreme. So why should we remain helpless?

The Government had constituted two commissions. In 1971 the Wangchu commission was set up. The first report looked into the sources of black money and in what

*English translation of the speech originally delivered in Bengali.

manner it was being channelized into the country, in great detail. All these issues were brought to the notice of the Government but no action was taken against the defaulters.

In the year 1997 the Voluntary Disclosure Scheme of Special Bearer Bond was introduced to unearth black money. But this scheme was so weak and ineffective that nothing much was achieved. The wealth of the nation is being amassed only by a few rich, well to do people while the rest of the countrymen are hungry and starving. We are busy with the loss incurred by the Kingfisher Airlines and are neglecting the plight of the poor people. Education and healthcare facilities are not available to them. The villages and rural areas are deprived of the basic amenities. Take care of them. Arrange for agricultural development, irrigation facilities, food security. This is for the betterment of our own country. Whoever is in power, try to feel the pulse of the masses. Realise that the countrymen are your own brothers, sisters, mothers. They are expecting a lot from you. Hon. Finance Minister is an erudite man, an experienced leader who hails from our state West Bengal. I request him to disclose the names of the account holders. I request the Government to function in a transparent manner. This will be in the interest of the nation ; in the interest of our people and for the welfare of the society.

With these words, I thank you sir for allowing me to participate in this debate and conclude my speech.















SHRI ASADUDDIN OWAISI (HYDERABAD): Mr. Chairman, Sir, I rise to oppose the Adjournment Motion that has been moved. I have only 10 points to make because of paucity of time.

Firstly, I would like the hon. Finance Minister to please enlighten all of us that what is the exact amount of black money in banks abroad. According to an IIM Professor of Bangalore, it is 136.5 billion dollar. I do not know how did he arrive at that figure and what data he has used.

Secondly, is it not true that the Investigation Wing of IT in this fiscal year has unearthed concealed income of Rs. 3,100 crore? The same Investigation Wing has unearthed Rs. 18,750 crore in the last two fiscal years, as black money.

Sir, my suggestion to the Government is that there is an immediate need to upgrade the legislative process to include the private sector as in the US, the legislation is there, called the Foreign Corruption Practices Act.

We have to adopt the OECD regulations. Another point which I would like to make is that 25 per cent of FDI comes from Mauritius. Where is this money originating from? It is from the private equity firms. There should be a definite inquiry into how white money is made from Kolkata.

16.05 hrs.

(Dr. M. Thambidurai in the Chair)

Another point which I would like to make is that the Government should ban Non-Profit Organisations that do not file tax returns. In this country, we have two millions NPOs. Out of two millions, 70,000 file tax returns. There are 39,000 NPOs which get foreign funding but they do not file their tax returns. Why cannot the Government reveal identities of holders of participatory notes? The Government should immediately abolish stamp duty on real estates in line with the recommendation of the Thirteenth Finance Commission.

In his speech, hon. Mr. Advani has talked so much on black money. I would like to bring to the notice of the House that during the NDA’s rule, HW Submarine scam was being taken up by the CBI. Why did it fail? The whole movement of middle man was not probed properly. Why did the NDA keep quiet on that?

Another point which I would like to make is that a lot has been spoken by the BJP and by the NDA on black money. I would like to ask this question to hon. Mr. Advani. Can he please enlighten all of us that in the late ’80s and in early ’90s, the Sangh Parivar had accumulated crores and crores of rupees in the name of Ram Mandir? Where has that money gone? We would like to know that.

Lastly, I want that the hon. Finance Minister to order a probe on the crores and crores of rupees coming to the Sangh Parivar organisations from abroad. That has to be stopped. That is the main source of black money and not the other way round.



DR. TARUN MANDAL (JAYNAGAR): Sir, the Government should unearth black money whether within the country or outside the country. There should not be any sort of protection for black money holders by any Government.

No Governments, either the one which is in power or the Government of the now Opposition Party can claim any credibility of unearthing or doing any serious effort for unearthing the black money and unearthing the amount of money which the black money holders are stashing away. After Independence, the country was ruled most of the periods by the Congress Governments but nobody, the NDA Government and even the UPA-I Government and United Front Government where the Left friends were there in the Government, did anything to unearth the black money and to bring home any culprits.

Almost all the speakers have admitted that black money is involved in the electoral process. Not only electoral process but our film industry, our sports and games—everything has been involved with black money. As because electoral process is involved, in almost every big party’s election funds, not only white money, black money is also involved. I want that every party should announce here in this House that they should not accept any money from any big business house, from any industrialist, from any multinational and from any corporate.

Really, if the Government is serious and interested, let them bring an Ordinance. Let them bring a Bill in this regard so that no courts, either the Supreme Court or any court of this land, can prevent this Parliament from taking real, serious and stringent action against the black money holders. Definitely, the Government should bring in a White Paper but my request is that that White Paper should be published in black paper but in white ink.

Not only that, black money is actually putting much pressure on our people who are already under pressure due to price hike, unemployment and retrenchment. We have already listened from the people who are in power that maximum money by way of FDI in different sectors is coming through tax haven.

We like to know and this House has the right to know who this Hasan Ali is. Who are in the background? Who are the politicians involved to protect these people? Earlier also, in the Question Hour in other discussion, I have asked the hon. Minister to please bring down this money, which is running a parallel economy in the nation and actually cutting down the throats of our poor people, common people in their day to day living. So, I will request the Government to please bring a Bill; please bring an Ordinance. Do not put forward multiple examples of the court verdicts rather the court had to direct the Government to bring out the names of the money launderers; of the black money holders. Many people are holding black money in this country in our banks. That should also be revealed. That has come out in many periodicals, journals, and leading dailies of this country. I will again request to our Government and our hon. Finance Minister to please take serious action on this very serious issue of plundering our people, our nation and eating away the entire polity of this nation.



DR. SHASHI THAROOR (THIRUVANANTHAPURAM): Sir, this is an old problem. It is a national problem and not a partisan problem. It is not one that requires Adjournment to the House, but rather constructive attitudes to deal with it collectively. No one on this side of the House disagrees that black money is a serious problem or that the black money stashed abroad should be identified and brought back, if possible.

Indeed, as an old UN hand, I was pleased when Shri L.K. Advaniji quoted so extensively Mr. Kofi Annan, the former Secretary-General of the United Nations. As you know, in those days I was at the United Nations, and I had the pleasant task of vetting and approving many of Mr. Kofi Annan’s statements before they were issued. I was very glad to see some of my own phrases being cited by such a senior Leader of the Opposition.

Yes, black money is particularly pernicious for a developing country like India. It is because it prevents much needed investments in health, in education, in roads and in welfare. There is no disagreement on that. Indeed, this is not, Advaniji, the first debate on this subject. I do not share your extensive experience of our House, but having researched the debates in this House on the subject of black money, there were debates on black money in each one of the first eight Lok Sabhas, where attempts were made to grapple with it. There was the Santhanam Committee Report; there was the Wanchoo Committee Report. There were general agreements in this House that black money in India is generated by various practices such as real estate sales, siphoning of Government resources from welfare programmes, kickbacks on Government contracts, especially international procurements, and malpractices in international trade, especially under-invoicing. Shri Bhartruhari Mahtab has already given us a very full list of these issues.

16.14 hrs.

(Madam Speaker in the Chair)



What is the scale of the problem? I think, Shri Laluji was quite right to be concerned and confused about the various numbers that we have seen flung about in the course of this debate. Amazingly, fanciful numbers have been mentioned. Advaniji has even cited Baba Ramdev. Baba Ramdev claims that it is Rs.1,456 lakh crores of black money. That will be equivalent to some 30 trillion American Dollars. Our entire GDP is only 1.5 trillion. So, that would mean that something like 20 times our GDP is supposed to be illegally sitting abroad. Much of the black money has been created when our GDP was much lower. In fact we only reached trillion dollars about four years ago. I think we should not probably get our economics from a yoga teacher.

The more realistic numbers are the ones that some have referred to, from the Global Financial Integrity Report called - The Drivers and Dynamics of Illicit Financial Flows from India 1948 to 2008. This was published in November 2010 by Global Financial Integrity. It concludes that we lost a total of 213 billion dollars in illicit money since 1948, the present value of which in today’s dollars would be about 462 billion. That is 20 lakh crores of rupees, which is serious money. But it is not the numbers that have been going around on the internet or we have been getting on our SMSes. Even when it comes to Swiss banks, which have been particularly highlighted here today, official Swiss bank figures show that only 0.07 per cent of all the assets in Swiss banks are held by Indians. That is, about something in the neighbourhood of 2.5 billion dollars out of 3.5 trillion dollars in Swiss banks by foreigners, under Rs.10,000 crore. We are not – I hasten to correct the hon. Members who have said this – the country with the largest Swiss bank deposits, as somebody said. We are certainly not more than all the other countries combined. I assure the hon. Members that these figures can be verified from the websites of the Swiss authorities.… (Interruptions)

Even one illegal rupee in a Swiss bank is unpardonable. But, let us at least agree on the dimensions of the problem. That is where we have perhaps been a bit confused in the debate today. The fact is that the Swiss banks are a red-herring in this debate. Essentially, Swiss banks pay one per cent interest at the most. It is highly unlikely that Indians with black money are leaving it there at that rate of interest. Far more likely is that the bulk is being reinvested elsewhere perhaps, including in our country, because in our country, as we have seen in the last decade, housing prices have risen ten times since 2000, we have seen the Sensex going up six times since 2000, we have seen Government bonds are offering 8 per cent whereas the best abroad is 3 per cent. So, we are a very attractive investment destination for Indian money.

It would not at all be surprising if money were coming back into India in what is called “round tripping” from places like foreign banks. 55 per cent of the foreign institutional investments in India in 2009-10, totalling 85 billion dollars, were made through the participatory notes route. This is something that has been mentioned by Shri Owaisi just now. A lot of this is illegal money that has gone and come back perhaps, but how do we find out? We know that our domestic investors have to fulfil stringent ‘know your customer’ norms. These are much more lax for participatory notes. We need investments from abroad. We need to soak up black money. We know that for many years, from 1951 onwards, we used to have voluntary disclosure schemes, various Government bonds and so on to soak up the money. In some ways the money is coming back into our country into productive investment that could partly explain what is happening here.

At the same time, there are specific concerns. 40 per cent of the total FDI coming into India comes from Mauritius. We have been trying to renegotiate the Tax Treaty we have with Mauritius. Inevitably our strategic interest will affect how far we can push the Government of the day in Mauritius. But the fact is also that the peculiarity with Mauritius is that the taxation laws there are applied to those who are residents in Mauritius. There is no taxation on capital gains in that country. If an entity sets up paper companies in Mauritius, their Direct Taxation Avoidance Agreement becomes in fact a non-taxation agreement, really a sort of double non-taxation agreement for us.

You know that we had under our Income Tax Department rules the power to examine and verify whether the resident status of a company in Mauritius was genuine or not. The NDA Government, of course, withdrew that power by Circular 789 of April 2000, which has already been mentioned here. Now, just a certification from the Mauritius Government is enough. Shri Yashwant Sinha has pointed out that the Supreme Court has upheld the validity of this decision. But, why was it done? It has actually rendered roundtripping much easier because there is no longer the power to question the residential status of a company in Mauritius.

I am also a little curious about the assumptions in some of the statements by the Opposition today that these tax haven countries are just waiting to hand over information and money to us if only our Government is tough enough to ask. The opposite is true. India can do a number of things with the banks of foreign countries; but only subject to the domestic laws of those countries and of course of international law, including treaties to which India is a party.

I think Laluji, Achariaji and others have asked what prevents the release of the names by the Government of India. It is very simple. India is a party to treaties and is subject to the secrecy clauses in the agreements signed with these treaties. For example, if you take the Indo-Swiss Agreement under the DTAA between India and Switzerland, information on Swiss bank deposits cannot be revealed by them until we provide evidence of criminality. If we provide evidence of criminality, they will provide it; otherwise, they will not do so. In fact, our position on this has been upheld by the Supreme Court in their order of July 4th on a petition submitted by Shri Ram Jethmalani.

The fact is Switzerland is ranked number one on this year’s Financial Secrecy Index compiled by the Tax Justice Network. Since 1934, breaking bank secrecy is a criminal offence in Switzerland. It is a country in which tax evasion is not a crime under their law. So, we can get their cooperation on illicit money, but we need to know the names of the individuals we are investigating, and of the banks where they have their money. Without credible and concrete evidence, no Swiss Government is going to render cooperation to any Indian Government. They said very clearly that they will not support fishing expeditions for names in their banks.

Now, the DTAA with India was amended actually by the Swiss in October, just two months ago, and a person under investigation may now be identified by means “other than name and address”, and the bank connection must be identified only to the extent known. That sounds good. But the same para adds that Switzerland will apply the principles of proportionality and practicability in evaluating any offer or request by the Indian Government. So, they can still say that our requests are not precise enough.

Now, to suggest that the Government of India has not been strong in its efforts is particularly unfair, because India has led the push in the G-20 on this issue, on black money, since the Pittsburgh G-20 Summit in 2008. The push in the G-20 against banking secrecy, against opaque cross-border financial dealings. India has been a leading player in this. Indeed, the West only woke up really after 9/11 when they saw terrorists were moving money, and then of course they got more excited after the global financial crisis in 2008-2009.

India has joined the Financial Action Task Force of the G-8. We have pushed the G-20 to restructure and strengthen the OECD’s Global Forum on Transparency and the Exchange of Information for tax purposes. I would like to quote from the Head of the Global Forum on Tax Transparency who says they would “rate India first in terms of promoting the standards, in terms of fighting tax evasion, and having the international community lining up behind it.” Indeed, Madam Speaker, the Director of the OECD Centre for Tax Policy and Administration has specifically said that “just two years into the OECD programme India has made remarkable progress. India has made its stand very clear at the G-20 and other global forums. It has negotiated up to 22 Tax Information Agreements, and now it has begun implementation. Hence, I have seen more progress in the last two years than in the previous two decades.” … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Let there be order in the House.

DR. SHASHI THAROOR : There has been a real progress being made by the Government.

In addition, Madam, the fact is that we have ratified this year the U.N. Convention against Corruption. Advaniji had citied this document. He had shown the U.N. Convention against Corruption. It is worth stressing that one of the main factors in the U.N. Convention against Corruption that makes it attractive for us is that they have a Chapter on International Asset Recovery, a major breakthrough, which is one of the reasons why developing countries like India wanted to sign the Convention against Corruption. Because reaching an agreement on this Chapter of Asset Recovery involved intensive negotiations, as the needs of countries seeking the illicit assets had to be reconciled with the legal and procedural safeguards of the countries which had the money in their banks. In fact, we tried of course to establish presumptions that this is national money which we need to claim from them and they in turn wanted to say that from their point of view, they had to protect their procedures that guarantee their banking secrecy and the assets in their countries’ banks.

But in the end the Convention against Corruption gives us what we want. It establishes ‘asset recovery’ as a fundamental principle of the Convention. There is a framework now in both Civil and Criminal Law for tracing, freezing, forfeiting and returning funds obtained through corrupt activities as long. As long as we can prove ownership, we can do this. In fact, if the country does not cooperate, the UN Convention signatories can use the Convention itself as a legal basis for enforcing confiscation orders. There is Article 54 (1) (A) of the Convention which provides that “Each State party shall take such measures as may be necessary to permit its competent authorities to give effect to an order of confiscation issued by a Court of another State party.” So, we have an instrument now and the Government has taken a number of related steps. It has enacted legislation incorporating counter measures against non-cooperative countries. For example, there is a 30 per cent withholding tax on companies from countries that do not cooperate with us. There are tightened provisions on transfer pricing. There is a provision in 30 of our DTAAs on assistance for collection of taxes, including taking measures of conservancy, and the Government is trying to put this into the other agreements as well. There are eight more income tax overseas units set up, more manpower has been deployed to the transfer pricing and international taxation and a large number of officers have neen given specialised training. So to suggest that the Government has not been acting, has not taken its responsibilities seriously, is really and completely inaccurate. And given these negotiations, the Government has been able to make specific requests in 333 cases to obtain information from foreign jurisdictions. It has already obtained over 9,900 pieces of information regarding suspicious transactions by Indian citizens.

Now, there was a reference made to the secret information passed to the Government in July by the French authorities which in fact reveal 700 bank accounts held by Indians in Geneva. All of these are being investigated. Hundreds of crores are already recovered. What is striking is that this has been done. One cannot criticise the Government for not doing this sooner because this involves data theft. You cannot expect any Government to go abroad to steal data.

What has happened now is, therefore, Madam Speaker, that we have the provisions, we have ratified the conventions, we have taken the necessary action and we are facing up to this Government’s responsibilities in solving the problem of black money.

Reference was made by many speakers to Hasan Ali Khan. The Hasan Ali Khan case is shocking. But he did get caught. His prosecution is evidence of the Government at work to prosecute the holders of black money abroad.

The fact is that there is a lot of domestic black money too. There is black money in politics, everyone is this Parliament knows. Black money is emerging from property purchases. In fact, under Chapter 20(C) of the Income Tax Act, it was actually possible for the appropriate authority to pre-emptively purchase property at the claimed selling price. But this provision was abolished again by the NDA Government in July, 2002. So, it is not that everything is not being done by the Government and everyone is cooperating on attempting to get black money. It seems to me, Madam Speaker that we need to incentivise compliance. The issue is not only about compliance. We have to agree. … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Hon. Member, you speak very well.

...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए। ज़रा शांत रहिए।

DR. SHASHI THAROOR : I would like to say that it is very easy to shout slogans or to clamour for adjournments. The real question here we have to ask is what can we do together. This is a national problem and the question we have to ask each other is what can we do together to resolve it. I would like to suggest a few things to the Opposition.

We have to tackle the problem of tax evasion which involves cooperation with the Government on tax reform and rationalization and on financial sector reform. We have to tackle black money coming from real estate, which means again cooperation on effective land titling on land revenue and land record systems and on eliminating policy distortions in that. And in the rationalization of taxation; it has been suggested that the stamp duties are a problem.

We have to tackle black money in education, which means that we need the cooperation of all parties in removing the scarcity of good education supply in our country. There are constraints in offering good quality education in our country, and that is why, some colleges are able to take black money to provide good education.

We need, Madam Speaker, to also have effective implementation of Government spending programmes, strengthen their implementation and financial management. This affects all of us.

We do need to tackle electoral reforms. The fact is that there are electoral reforms needed which require political consensus in this House. The President of my party has called for Government funding of elections and the issues need to be looked into collectively. We have all accepted that there is black money in elections. We must overturn that practice.

We have to deal with the corruption issue. We are now having before us shortly a Bill on the Lok Pal. We will have to create an effective mechanism to deal with corruption.

And as Dr. Farooq Abdullah pointed out earlier today, we must take action against money involving criminal activities, terror-related funding, and initiatives to reform and strengthen law enforcement and criminal justice.

In other words, I would respectfully say to the Opposition that instead of adjourning the House, I would call on the Opposition to let us work together to deal with the real problems facing this country. There is a great deal to be done. We do not need to adjourn the House; we need to use the House to create the policies and the reforms that will give us an effective hand to deal with black money whether here or abroad.



श्री अनुराग सिंह ठाकुर (हमीरपुर, हि.प्र.): अध्यक्ष महोदया, सबसे पहले मैं सदन की ओर से, अपनी ओर से और देश की जनता की ओर से आडवाणी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि सड़कों पर भी और सदन के अंदर भी काले धन के गम्भीर मुद्दे को लेकर उन्होंने जनता को जागरूक किया और इस उचित मुद्दे को उठाया। यह सचाई है कि काले धन का मुद्दा बहुत पुराना है और आज के दिन तक जहां यूपीए की सरकार के समय में रिकार्ड तोड़ भ्रष्टाचार के मामले सामने आये हैं। एक तरफ आम आदमी महंगाई की मार से मर रहा है, बेरोजगारी उसे सता रही है और दूसरी तरफ मंत्रियों के ऊपर 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप लगे हैं। काला धन महत्वपूर्ण है, यदि देश के अंदर आयेगा तो आम आदमी के जीवन पर असर डालेगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में यदि सड़कों और बाकी आधारभूत ढांचे की सुविधाएं चाहिए तो उनमें सुधार हो सकता है। लेकिन काले धन का नुकसान क्या है, आज इससे देश को क्या नुकसान हो रहा है? पहली बात यह है कि टैक्स के माध्यम से जो पैसा आना चाहिए, वह पैसा नहीं मिल पा रहा है। दूसरा यदि वह पैसा अर्थव्यवस्था में आता है तो उससे और ज्यादा विकास होगा। तीसरा वही पैसा इस देश के खिलाफ भी इस्तेमाल होता है, जब उस पर हमले होते हैं, आतंकवादी गतिविधियों में उसका इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह एक गम्भीर मुद्दा है। इस पर पूरे सदन में बहुत गम्भीर चर्चा हुई। लेकिन जिस तरह उस गम्भीर चर्चा को मेरे मित्र श्री मनीष तिवारी ने दुनिया भर की बातें करते-करते कहा कि यह दुनिया भर में होता है और साथ ही यह भी कह दिया कि हसन अली ने पैसा इनकी सरकार के आने से पहले बनाया था। मैं पूछना चाहता हूं कि यदि जनवरी, 2007 में पहली रेड हुई तो दिसम्बर, 2008 में नोटिस क्यों भेजा गया, इसमें दो वर्ष क्यों लगे? इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को मार्च, 2011 में कहना पड़ता है, दबाव बनाना पड़ता है, तब आपकी सरकार जागती है, क्या उससे पहले हाथों में मेंहदी लगी हुई थी, क्या आपको उसके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी? एक घोड़ा बेचने वाले पर कार्रवाई करने में आपको चार वर्ष लग गये, जिसके पास चालीस हजार करोड़ रुपये हैं। आप लोग कोई कार्रवाई नहीं कर पाये और आप कहते हैं कि आपके समय से पहले का पैसा है। फिर आप सत्ता में क्यों है, क्या आपको कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी? आप केवल इतना कहकर अपनी जान नहीं छुड़ा सकते। इस पर सदन को जवाब चाहिए और मुझे लगता है कि मंत्री जी इस पर जवाब देंगे।

महोदया, डबल टैक्सेशन एवॉइडेंस एग्रीमैन्ट की बात कही गई, यह 19.08.2011 को साइन किया गया। आखिर आपको किसने रोका था कि फाइनेंशियल ईयर 2012 से पहले की जानकारी आप न लें। क्या इस पर चर्चा हुई, क्या आपने सदन से पूछा कि उससे पहले की जानकारी आप नहीं लेंगे। जिन लोगों ने पिछले पचास वर्षों में पैसा बनाया, जिनके लाखों करोड़ रुपये विदेशी बैंकों में पड़े रहने की बात कही जाती है। क्या देश की जनता को जानने का अधिकार नहीं है कि 2012 से पहले वह किसका पैसा था? आपने अपने मन से तय कर लिया कि हमें उसकी जानकारी नहीं चाहिए। यह सदन और देश जानना चाहता है कि आखिर वह किसका पैसा था। वह देश से लूटा हुआ पैसा है, देश उसे वापस लाना चाहता है। वह गरीब आदमियों पर खर्च हो, वह राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित हो, ऐसी हमारी मांग है।

इसके बाद आपने फ्रांस सरकार की बात कही। आपको जो सात सौ खाते मिले, वे कहां से आये? स्वीट्जरलैण्ड के बैंक में काम करने वाले अधिकारी ने चुराए थे। उसने वे फ्रांस की सरकार को बेच दिए, जिसने आपको दिए। न फ्रांस में वह कमाई हुई, न वहां पर टैक्स बनता था। आपका कौन सा एग्रीमेंट उसमें काम पर आता है? कहां पर डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट उसको रोकता है? मुझे नहीं लगता कि रोकता है। वह तो चुराए हुए खातों की जानकारी है। आपके ही एग्रीमेंट का मैं आर्टीकल-28 आपको पढ़कर सुनाता हूँ -



“However, if the information is originally regarded as secret in the transmitting state, it shall be disclosed only to person or authorities including courts and administrative bodies involved in the assessment or collection or enforcement or prosecution in respect of the determination of appeals in relation to the taxes which are subject of the convention. Such person or authority shall use the information only for such purposes, but may disclose the information in public court proceedings or in judicial decisions.”



प्रोसीक्युट करने के लिए आपको कौन रोक रहा है? न आपको ट्रीटी रोकती है और न प्रोसीक्युशन करने के लिए आपको रोका जा रहा है। कहीं भी आपके ऊपर रोक नहीं लग पा रही है तो आप जानकारी क्यों रोक रहे हैं? आप क्यों नहीं आंकड़े बताना चाहते हैं? हमारी पार्टी सबसे पहले आई और हम सब ने लिख कर दिया कि हमारा कोई खाता नहीं है। आपके सांसद लिख कर क्यों नहीं देते हैं? ये सात सौ आंकड़े रोकने की जरूरत नहीं है। मैंने खुले शब्दों में कहा है कि न आपकी ट्रीटी रोकती है और न ही वह धन फ्रांस में कमाया गया है। अगर और जानकारी चाहिए तो उचित समय पर मैं आपको दे सकता हूं।

आपने कहा कि मॉरीशस रूट से पैसा आता है। मनीश जी हाऊस में बड़ा ज्ञान बांट कर गए हैं। मॉरीशस सरकार के साथ वित्त मंत्रालय का ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप बना हुआ है। सन् 2006 से लेकर सन् 2011 तक 6 बार बैठकें हुई हैं। उसमें से क्या निकल कर आया है? क्या उस पर कोई कार्यवाही हो पाई है? आज आप कहते हैं कि नए टैक्स हैवन्स बन गए हैं। मैं बहामास का उदाहरण कोट कर रहा हूँ। सन् 2008-09 में 2.2 मिलियन डॉलर का ट्रेड था वह आज 2.2 बिलियन डॉलर का हो गया है। मतलब कि एक हजार गुना बढ़ा है। इसका क्या कारण है? ऐसा कौन सा व्यापार बढ़ गया कि यूएस और यूरोप में आपका व्यापार कम हो रहा है और बहामास जैसे छोटे से देश में आप एक हजार गुना ज्यादा व्यापार कर पा रहे हैं।

देश जानना चाहता है कि आपकी सरकार क्या कर रही है? उचित कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है? इन्होंने कह दिया कि हमने 34 हजार करोड़ रूपये ओवर इनवाइस और अण्डर इनवाइस के माध्यम से रोके हैं। उन लोगों के नाम की सूची जारी कीजिए जो देश का पैसा लूट रहे हैं। उसके लिए तो आपको कोई एक्सचेंज इन्फॉर्मेशन ट्रीटी तो नहीं चाहिए, डीटीए तो नहीं चाहिए। वह तो आपके देश के लोग हैं जो पैसा खा रहे हैं। आप उसकी जानकारी क्यों नहीं देते है? किसने आपको रोक रखा है? आप ऐसे भ्रष्ट लोगों को बचाने में क्यों लगे हैं? आप सन् 2012 से पहले की जानकारी लेना नहीं चाहते हैं। जो टैक्स खा रहे हैं, आप उनका पैसा लेना नहीं चाहते हैं। जो ओवर इनवाइस और अण्डर इनवाइस करते हैं आप उसकी जानकारी देश को देना नहीं चाहते हैं। लालू जी ने कहा कि नेताओं को भ्रष्ट कहा जाता है। अगर आप संसद को बचाना चाहते हैं तो कम से सदन को जानकारी देने का प्रयास कीजिए नहीं तो लोग यही कहते रहेंगे कि देश बच नहीं पाएगा।

आपने Study on Unaccounted Income and Wealth Both Inside and Outside the Country के लिए एक कमेटी बनाई है। उसको एक वर्ष होने जा रहा है, उसकी कितनी बैठकें हुई हैं? दिसंबर 2012 में उसकी रिपोर्ट सौंपनी हैं। क्या आप दिसंबर 2012 में उसकी रिपोर्ट सौंप देंगे? क्या उसकी एक भी मीटिंग हो पाई है और उन्होंने क्या कार्यवाही की है, मैं उसकी भी जानकारी चाहता हूँ।

सीबीडीटी के पहले से ही सिंगापुर और मॉरीशस में दो ऑफिस हैं। अभी शशि जी ने कहा कि 40 प्रतिशत पैसा वापस आता है। आपके ऑफिस ने आपको क्या जानकारियां दी हैं? यह भी मैं जानना चाहूंगा। आप आठ नए ऑफिस खोलने जा रहे हैं, प्लम पोस्ट क्रिएट करने जा रहे हैं। केवल एक विदेशी जगह पर आप उनको पोस्टिंग देने की तैयारी कर रहे हैं या सही मायनों में कुछ वापस भी आएगा। जो आंकड़े आपके पास हैं, सात सौ खातों की जानकारी आपके पास है, आप उनकी जानकारी नहीं दे पा रहे हैं तब विदेशों में ऑफिस खोलने से आपको क्या लाभ मिलने वाला है? कृपया उस पर भी प्रकाश डालिए। सन् 2005 में यूएन कंवेशन क्रप्शन की जो ट्रीटी हुई, आपके हस्ताक्षर करने के बाद, उसे रेटिफाई करने में सात वर्ष लगा दिए। देश जानना चाहता है कि आखिर सात वर्षों तक ऐसा क्या होता रहा कि हम उस पर कार्यवाही नहीं कर पाए। हम क्यों रूके रहे? जहां दुनिया हमें देख रही है कि भारत दुनिया का अग्रणी देश है, यह दुनिया की महान शक्ति बनने वाली है। जब करप्शन को रोकने की बात आती है, तो देश के अंदर भी आपके हाथ कांपते हैं और बाहर भी ट्रीटी साइन करने के लिए हमारी सरकार पीछे की ओर देखती है। वर्ष 2012 के बाद के आंकड़े की हम बात करते हैं, हम क्यों रोक रहे हैं? मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि अमेरिका ने अगर स्विटजरलैंड के बैंक यूबीएस से ढाई सौ खातों की जानकारी ली और बदले में सात सौ मिलियन डालर की पेनॉल्टी भी देनी पड़ी, उन्होंने खातों की जानकारी ली, ऐसा लगता था कि स्विटजरलैंड के बैंक के खातों की जानकारी दुनिया को कभी नहीं मिल पाएगी, लेकिन यह असत्य निकला। वर्ष 2008 की इकॉनामिक क्राइसेस के बाद लगातार अमेरिका ने दबाव बनाया, उनसे जानकारी ली, सात सौ अस्सी मिलियन डॉलर पेनॉल्टी के तौर पर भी लिए। आज बावन हजार नए एकाउंट्स की जानकारी उन्होंने मांगी है। भारत ने क्या किया है, हमारा देश क्या कर रहा है, हमारी सरकार क्या कर रही है? हम कहते हैं कि वर्ष 2012 से पहले की जानकारी मत दो, इसका कारण क्या है? अमेरिका के ऊपर एक हमला होता है, 9/11 में, अमेरिका अपने देश से उठकर ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में जाकर मारता है। हमारी संसद पर हमला होता है, जहां हम बैठे हैं, जिसकी हम बात करते हैं, डेमोक्रैसी को बचाने की बात करते हैं, लोकतंत्र पर हमला होता है, अफजल गुरू हमला करता है, पिछले दिन इस घटना को हुए दस वर्ष हुए, जबकि अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनाए हुए सात वर्ष हो गए...( व्यवधान) हम उनको संरक्षण देते हैं...( व्यवधान) इसी सदन के ऊपर हमला हुआ था और मुझे इस बात का दुख है, जैसा कि लालू जी ने पहले भी कहा कि आपस में लड़ने की बजाए, जो विदेशी ताकतें हैं, every nation has zero tolerance against terrorism. But our Government has an appeasement policy for terrorists. Why are we protecting them? सात वर्षों से हम टैक्स पेयर्स का पैसा बर्बाद कर रहे हैं।...( व्यवधान) हम उनको संरक्षण देने में टैक्स पेयर्स का पैसा बर्बाद कर रहे हैं। यह काला धन जो यहां से जाता है, यही बैक रूट होकर इससे हमारे देश के खिलाफ हमले होते हैं। कुछ युवा नेता यह भी कहते हैं कि हर हमले को नहीं रोका जा सकता है।...( व्यवधान) आपने यह कहा, आपके नेता ने कहा, लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं...( व्यवधान)

THE MINISTER OF NEW AND RENEWABLE ENERGY (DR. FAROOQ ABDULLAH): I do not want to object his speech. मैं इनसे और सदन से एक बात कहना चाहता हूं कि बहुत अच्छी बात है, आप आरोप तो लगा लेते हैं, मगर जब जहाज यहां से कंधार गया...( व्यवधान) उन लोगों को किसने छोड़ा, जिन्होंने वहां लोगों को मारा है। मेरे अपने रिश्तेदार, मेरे चचेरे भाई को मारा घर जाकर, मेरे एमएलए को मारा...( व्यवधान) उनको वहां कौन ले गया...( व्यवधान) क्या उस वक्त यह मैसेज नहीं गया कि यह सॉफ्ट स्टेट है?...( व्यवधान) You may please remember that.याद रखियेगा आप एक अंगुली उठाते हैं तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ भी देखती हैं।...( व्यवधान) कहना बहुत आसान है।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record, except his speech.

(Interruptions) … *

MADAM SPEAKER: Hon. Minister, please sit down. It is over. The time is over; please wind up.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : अब आप समाप्त कीजिये, आपका समय पूरा हो गया है। अब आप समाप्त कीजिये।

…( व्यवधान)

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : महोदया, मैं अपनी रक्षा, सुरक्षा की बात नहीं कर रहा हूं। मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब यह बात आती है कि भारत पर हर हमला नहीं रोका जा सकता है तो एक आतंकवादी, जिसे फांसी की सजा सुनायी, उसे तो फांसी दी जा सकती थी।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब आप समाप्त कीजिये। आपका समय समाप्त हो गया है। कृपया समाप्त कीजिये।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please conclude. We have to have the Minister’s intervention at quarter to five.

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : महोदया, क्या फारूख जी यह कहना चाहते थे कि आज हम फिर नरम हो जायें? क्या आज समय नहीं आ गया है, दुनिया दूसरे देश में जाकर आतंकवादियों को मार रही है, हम अपने देश में फांसी नहीं दे सकते।

अध्यक्ष महोदया : ठीक है।

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : इस घटना को दस वर्ष हो गये हैं। महोदया, यह वही काला धन है, जिसकी मैंने इनीशियली चर्चा की थी। यह मैंने तीसरा प्वाइंट बताया था, जो आतंकवाद के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

MADAM SPEAKER: Please conclude now.

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : आज मैंने भ्रष्टाचार और काले धन की बात इसीलिए कही है। ...( व्यवधान) आप सुन लीजिए। Madam, there is no order in the House. ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : क्या हो गया है आपको? क्या कर रहे हैं आप?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब आप समाप्त करिये।

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : जिस आम आदमी के नाम पर वोट मांगकर आए थे, आज वह आम आदमी की सरकार नहीं, खास आदमी की सरकार बन गई है। क्योंकि आम आदमी पर जो पैसा खर्च होना चाहिए, उससे खास आदमी को बचाने का प्रयास सरकार कर रही है। लगातार प्रयास हो रहा है कि उन नामों को आम आदमी तक न जाने दिया जाए। आम आदमी जानना चाहता है, सदन जानना चाहता है, देश जानना चाहता है कि कौन वे भ्रष्ट लोग हैं, किनका पैसा है? फ्रांस के साथ कोई ट्रीटी आपको नहीं रोक रही है। मैंने आर्टिकल 28 भी पढ़ा है। यह पैसा फ्रांस में भी नहीं कमाया गया, इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि ये नाम देश को बताने चाहिए। सदन और देश इंतज़ार कर रहा है कि उसको वे नाम मिलें।

अध्यक्ष महोदया : अब आप बैठ जाइए।

SHRI ANURAG SINGH THAKUR : Let me make my concluding remarks.

MADAM SPEAKER: Please sit down.

SHRI ANURAG SINGH THAKUR : Madam, I will take only one minute more.

अध्यक्ष महोदया : आप आधे मिनट में समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : बीडीएस में 1951 में 70 करोड़ रुपये आए थे, 1965 में 145 करोड़ रुपये, और जब इकोनॉमिक लिबरलाइज़ेशन हुआ 1991 के बाद, तो 33697 करोड़ रुपये 1997 में आए। काला धन देश और विदेश में बहुत है लेकिन सरकार गंभीर नहीं है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि अब समय आ गया है गंभीर होने का। पूरे देश की जनता आज देख रही है कि काले धन पर सरकार क्या कहने वाली है। मैं केवल दो लाइनें कहकर अपनी बात समाप्त करूँगा। उससे पहले मैं यह कहूँगा कि आज सरकार को गंभीर होना चाहिए। काले धन और भ्रष्टाचार पर कड़े कानून बनाने चाहिए और उसमें कड़ी सज़ा का प्रावधान होना चाहिए, ऐसा मेरा आपसे अनुरोध है। केवल दो लाइनें कहकर मैं अपनी बात खत्म कर रहा हूँ। ( व्यवधान)

“कर रहा साजिश अंधेरा सीढ़ियों में बैठकर

रोशनी के चेहरे पर क्यों कोई हरकत नहीं।”



THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Madam, Speaker, I would have liked to start my observations… (Interruptions)

श्री लालू प्रसाद (सारण): दादा, हिन्दी में बोलिये। ...( व्यवधान)

श्री प्रणब मुखर्जी : सब्जैक्ट बहुत गंभीर है, इसलिए मुझे अंग्रेज़ी में बोलने दीजिए।

Normally, when I start my observations I always appreciate the mover or the leader of the discussion but this is a particular Motion on which I cannot do it, even technically, because it is an Adjournment Motion and at the end of it I will have to oppose it. But surely I would like to appreciate senior Leader Shri Advani ji’s Jan Chetna Yatra. As a Finance Minister, like any other Finance Minister, I would like to watch the outcome of his yatra if it can influence the tax-evaders, the tax-dodgers and black-money generators to reduce their activities and help the exchequer to get the money due to it. As I understand, ‘Jan Chetna’ means to create awareness amongst the people, to create some sort of social awareness and if it is achieved, surely I would like to congratulate him for taking that trouble at this age to have such an arduous journey from one end to the other end.

Having said that, I would like to start with how black money is generated? What is the quantum of black money? What steps we have taken in this regard? What steps you could not take? I am not going to enter into the debate to win some brownie points here and there. It is because the issue is serious. Like many other serious issues, I would like this House to debate, discuss and decide that how effective steps can be taken to get rid of this menace.

Whatever be the quantum, I am not indulging in any fancy figure. I do not have the liberty to indulge in that fancy figure. It is because of the Office, I am occupying. I have figures as per reports of the Swiss Banking Association. After my two years’ sincere efforts, I could not locate where this Association is. What they do? When I asked through our Ambassador to Switzerland, they have expressed their inability to identify any such organisation. But this Organisation had a very prominent place in Indian media for several days together.

So, I am starting with their assessment. Their assessment is 1500 billion to 1900 billion US dollars. According to BJP’s Task Force, Report which was circulated during the General Elections of April, 2009, it is varying from 500 billion US dollars to 1400 billion US dollars. If my figure is incorrect, somebody from that side could correct me.

According to the Global Financial Integrity from 1948, one year after Independence to 2008, 213 billion US dollars have been lost by India since Independence till 2008. The current value of those 213 billion US dollars would be 462 billion US dollars.

But none of these agencies – of course, not non-existing agencies - have clearly defined the assumption. Therefore, when this Debate started, the first task I did, I wanted to have an authentic and authoritative assessment, if possible to make by three important institutions. They are National Institute of Public Finance and Policy; National Institute of Financial Management and National Council of Applied Economic Research.

I have mandated them to make an assessments independently. I will provide them the necessary funds to come out with a dependable assessment of the size and quantum of black money.

Now, what type of strategies are we following? I have discussed this issue on the floor of the House earlier in other forums also. I am talking of the five pronged strategy. We may have emotions and we may indulge in very high sounding phrases but it does not help me when I am to act with other sovereign countries.

There are laws, international practices and norms. I shall have to follow them. Therefore, for the information I would like to have, the instrument, which is available to us, is Double Taxation Avoidance Agreement. We can collect bank information through this Double Taxation Avoidance Agreement. We have 82 Double Taxation Avoidance Agreements. For quite some time, these Double Taxation Avoidance Agreements were being signed to facilitate those entities which are having cross-country operations to avoid double taxation in both the countries. Therefore, primarily it is a trade facilitator.

Here I would like to most respectfully submit to Advaniji that this did not become concern of the world with the UN Convention. The UN Convention dealt substantially on money related to drug trafficking, narcotics and crimes which are funding terror activities. Even the Convention 2003 is substantially dealing with it. Of course, tax evasion and avoidance is one part. But in many countries, tax evasion and tax avoidance, unless there is a fraud, are not crime. But the issue came to the international forum and was debated in the international fora after the London Summit of G-20 in October 2008. Thereafter, it was followed by Pittsburgh Summit. Then, it was followed by Seoul and it was also followed in the last Summit at Cannes where our Prime Minister very strongly pleaded for an automatic exchange of information. I would like to quote from his observations there: He said:

“G-20 countries should take the lead in agreeing to automatic exchange of tax related information with each other, irrespective of artificial distinctions such as present or past, tax evasion or tax fraud in the spirit of our London Summit that the era of bank secrecy is over.”



There is no lack of initiative from 2010 to November, 2011. Before the Summit, the G-20 Finance Ministers met. It is my recorded speech. In every meeting including on 12th February at Paris, I said that we shall have to ensure that we get this information automatically.

What observations were made by the international commentators on the Prime Minister’s speech, I am quoting. It is from GFI. Advaniji has quoted very profusely from GFI. The GFI noted in a recent press release:



“While the final declaration mentioned automatic exchange of tax information as a potentially useful tool in tackling non-cooperative jurisdiction, it stopped short of calling for its implementation, instead stating that they would consider it on a voluntary basis or as appropriate.”







17.00 hrs.

OECD also is recognising this. In an interview published in today’s Economic Times in reply to a question as to why we are not getting the information, the OECD spokesperson said:

“I must say that you “Indians” are being very impatient. If you look at other countries, the process to get the Agreement signed, its ratification and implementation itself has taken a lot of time. India started the process 18 months ago and signed 22 agreements already. This is more than the numbers of agreements the United States have. Your Tax Administration is building capacity to make use of these agreements. India has done a good job on this score also highlighting the G-20 issue. It takes time and so you must have some patience.”



They have recognized that India is one of the three fast moving countries in this direction. It is true that we started two years ago. Why? It is for the same reason as you mentioned one that during your tenure, during our tenure, all the banks, not merely Swiss Bank, located at tax havens -- tax havens are not located in developing poor countries like India, but all of them are located in industrialized developed countries – doggedly refused to share banking information in the avoidance of Double Taxation Agreement. Therefore, you could not do anything; we could not do anything. But when the G-20 countries including USA had put pressure, then they started negotiating. I have given the figures. The total number of Double Taxation Agreement we started with were 75. We have completed Double Taxation Avoidance amendment incorporating clause 26 of OECD in our Agreements where sharing of the bank information has been agreed upon. Today including the new Double Taxation Agreement, where we have inserted this clause, along with the main Agreement, Tax Exchange Information Agreement with the sovereign jurisdiction, we have completed 60 which includes renegotiations of 24 DTAA out of 75. The remaining are in the process of negotiation. So, I do hope that it would be possible for us to complete this exercise early.

Even with Switzerland we have completed the agreement. A lot of mis-information have been spread that we will sign the agreement in 2012. I do not know from where this date has come. When the Agreement was signed with Switzerland – I am not to get this information from anybody else because I am the signatory to this Agreement along with the Swiss Federal Ministers – in August 2010, they said that they will give us prospective information and not retrospective information. Please believe me, no country of the world, not even the USA, not even France, not even UK got information from Switzerland, through the legal Treaty, retrospectively. Nobody did get it. Everybody got prospectively. What happened in the case of Switzerland? They said that it will be done on 1st of April, 2011. I said: “Why can’t you do it earlier?” They said: “Look, Mr. Minister, unlike your country, we have a very elaborate provision of ratification of International Treaty and Agreement. I am not quite sure whether I will be able to complete it in one year. Both the Houses of Parliament of Switzerland will have to pass it. After that, it will go to all the Cantons. They will have to ratify it. The specific period of four to six weeks is to be given to each Canton and ultimately, it was ratified not even on the 1st of April, 2011. It was ratified in October, 2011 but it will be effective from 1st of April. We will get the information. Whatever information we will get, we will definitely like to act on it.”

On our efforts, I would just like to quote from an article of Ann Hollingshead.

“The more important and more effective course of action is to stem the outflow in the first place and in the recent months, India has significantly expanded its efforts in this area to this end. India recently joined the Financial Task Force and the Task Force on Financial Integrity and Economic Development Partnership Panel."



She has also stated:

“India is one of the three countries which has been recognized as doing quite strong and well in operating against the black money.”



Surely, self-criticism is good but not self-condemnation. I have no problem if you criticize. The entire exercise started from Pittsburgh Summit and still the process is yet to be completed. It is to be completed in the sense that the automatic exchange information and past information are not yet available.

Shri Advani has raised a number of points. I would like to respond to those points. First of all, he has referred to the act of dirty money. He has discussed about dirty money. I heard Shri Advani with great attention when he spoke on dirty money relating to drug trafficking, etc. We are fully aware of it. To take appropriate action, this Parliament has received the legislation. Narcotics and Psychotropic Substances Bill has been introduced in the last monsoon Session of Lok Sabha. It is currently under the consideration of the Standing Committee and when the Standing Committee will send its Report, surely we will work on that Report.

I have already mentioned about the Swiss Bank. French accounts are there. But your interpretation is not correct. Not once, but twice I had meetings with the French Finance Minister. I said: “Some of our countrymen are saying this information you did not get from legal sources. You had some other sources. I do not want to know what sources you have. But can I disclose this information?” He said: “No, Mr. Minister. You are getting information from me through the legal channel of the Double Taxation Avoidance Agreement. From where I got the information is not your business. With a sovereign country, I am sharing the information with certain conditions.” Shri Thakur rightly quoted that for tax purposes, all tax avoidance cases barring, all tax evasion cases and all concealment cases in this country till today are not penal offences, nor are they criminal offences. Neither your Government did anything nor my Government did anything. You considered it proper that the Income Tax Department is not to administer the IPC. Our job is to prevent tax evasion and tax avoidance and if we get the taxes we are satisfied. If you feel strongly that it should have been done, what prevented you from doing it for six years? It is because we know what job is to be done by whom.

Regarding insisting on getting information, let us think of a situation like this. Suppose I publish the 36,000 pieces of information, and names from different countries, to satisfy the inquisitorial interest of the Members of Parliament. Tomorrow, the same countries will tell: “Mr. Minister, you have violated the international agreement. Sorry, we will not share any information with you.” Then, what should we do? We will dry up the sources. I will publicise the names. Please do not forget that these people are not naives. When they operate black money, they know what to do. Once their names are disclosed, immediately they will withdraw the money from their respective banks. You will not be able to trace it. … (Interruptions) This suggestion has come from the former Home Minister and former Deputy-Prime Minister of the country! … (Interruptions) Please listen. … (Interruptions) When you collect information, there should be an element of surprise. When the Income Tax Department gets information that somebody is holding black money, somebody is holding unaccounted money, should I publicise it? Or should I go and search and seize the money? How is the intelligence collected? An element of surprise is there. How is the information collected normally? An element of surprise is there.

I can show you under what conditions these are being given. When there is a case of money laundering or when there is a case of criminal activity, when these persons are prosecuted, definitely their names can be disclosed. So many speculations have been made. Former Deputy Prime Minister, Shri Advani referred to a judgement. It is about Shri Jethmalani’s case. The judgement is not yet complete. It was an interim judgement. The Department has challenged that judgement. It has been sent to the larger bench. The judicial process is yet to be completed and we are discussing it in the Parliament! I would have ignored it if it was mentioned by anybody else. But when it comes from the former Deputy Prime Minister or the Home Minister of the country, I am really a little disturbed over it. The process has not yet been completed.

There is another issue which has been raised is about the actions which we have taken. Yes, we have unearthed Rs. 66,000 crore. Now, we have established a Criminal Wing in the Income Tax Department. What did you achieve? What was your performance when the Transfer Pricing Act was passed during your time? How much money have you received by preventing transfer pricing? I am not blaming anybody because we did not have that expertise. Those who are the tax evaders and who are the tax avoiders are equally clever persons and they know what to do and how to operate. Therefore, this is a constant battle between the tax evaders and those who are implementing the tax laws.

Madam, my respectful submission is that the issue of black money is very serious. We shall have to find out how to prevent it and how to bring it back. Some Hon. Member has suggested that “declare it as a national asset”. Yes, I declare it as a national asset and this Parliament declares it as a national asset – money located in Swiss Bank is a national asset. How would you get it? Should I send forces? We can get it only through the tax agreement and through the international agreement. So, that aspect is to be kept in mind .

You have referred to the Swiss Restoration Act which has been passed in 2011. You want to know what action we have taken. What is the content of that Act? The content of that Act is not merely of tax evaders or tax avoiders and those who are politically associated. You have referred to the former President of Philippines. I am not going to take the name of the country where somebody taught us that India is the first among the countries whose citizens have black money in foreign banks. I have got a published list, but for obvious reasons I cannot mention the name of the countries. Nowhere India is there in the first ten countries. But we can easily say that India is on the topmost list. Yes, there are people; there is black money; there is unaccounted money. So, those unaccounted money ought to be brought in. Please analyse the existing Act. Somebody has demanded that you will have to confiscate. We are making the provisions of the Prevention of Money Laundering Act more stringent. I have given a notice to this House to introduce the Bill and in this Session itself, the Bill will be introduced. But mere introduction of the Bill does not help me if this is not passed and it cannot be passed, if half of the Session goes without discussing anything. We are talking of the sovereignty of the Parliament. Yes, we are sovereign. We are talking of the image of the politicians. I can issue instruction to my Income-Tax Department saying that you put a clause saying that while filing the returns, they will have to make a statement whether they hold any unaccounted money or not. Nobody will say “I hold unaccounted money.” Nobody will say “I am a black money holder in foreign bank.” But, despite that, we can try to squeeze as much information as possible. But the image of the sovereign Parliament will be restored if even in one Session we, from the day of beginning to the day of adjournment function without disruption. This is my view. If we can transact the legislative business, even if we can have this type of a discussion, it will be good.

Normally, the Government does not accept Adjournment Motion. Shri Advani is correct that it is some sort of a censure. But why did I accept it? I accepted it because I felt that at least the House could discuss something. Even if it is not a Government business, even if it is for the condemnation of the Government, I thought let me accept it because some normalcy would come back. What are we doing in the past two weeks? How you disrupted it? The very demand was that it must be an Adjournment Motion both on price rise and black money. Black money is being generated from 1948 till 2008. What is the urgency in it? What suddenness is associated with it? Even, however pernicious it may be, if it does not have any gross failure of the Government in immediate immediacy, how could you link it with the Adjournment Motion? The House could not function. It was disrupted. I thought at least let me concede and agree to it. I am grateful to Shrimati Sushma Swaraj that we agreed on the text. Shri Advani also agreed to it. Therefore, there is no harm in it. But the short point which I am trying to drive at is that we can do much more if we can simply bring back normalcy.

You have demanded a White Paper. I have already, in response to a question on the floor of the House, stated that I would bring a White Paper. I will give all the information, whatever information you want because there is no conflict of interest here. I do not believe that you are protecting the black money holders. You may accuse me. I know that I do not protect any black money holder. My Party does not protect any black money holder. Therefore, I do not find any conflict of interest between your objective and our objective. If there is no conflict of interest, why can we not work together? You wanted a discussion. The discussion could have been under Rule 193. Two precious days would not have been wasted. What additionality can you have except dividing the House on the motion whether the House would be adjourned or not on this issue? I am, perhaps, a most illiterate man out of the 545 Members of the Lok Sabha! Probably, I do not understand what great benefit we are getting by dividing the House on the Motion whether the House should be adjourned or not on the issue of the black money generation, how to tackle the black money and how to bring back black money. Yes, we shall have to take concrete action. I have given the action plan. You find out and say: “Mr. Minister, there is the deficiency. You do this.” I am seriously asking you this. Do you want the Income-Tax Act to be a Penal Act? Is there any dearth of the stringent laws? In 1976, this House itself passed two Acts – either in December 1975 or 1976. One was the Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Activities Act, COFEPOSA. Another Act was the SAFMA - Smugglers and Foreign Exchange Manipulators (Forfeiture of Properties) Act. What is the status of those two Acts? COFEPOSA is still in operation. I was then young man. As the Minister of State in the Ministry of Finance, I piloted these two Bills. After 25 years, I went to North Block in 2009 January. I enquired: “Are these Bills still in the Statute Book?” The reply was: “Yes, they are still in the Statute Book but they are not in operation.” There is no dearth of laws. Many a time, I get the suggestion on amnesty schemes. I got these types of suggestions earlier also. In 1992, when I was the Finance Minister, while entering into extended funding facility arrangement, borrowing arrangement with the IMF, I was told: “Why don’t you allow some sort of amnesty to get back the foreign exchange from abroad?”

In 1992, we were forced to do some sort of things like that and received a stringent comment from the Judiciary. Therefore, depending on the economic situation, prevailing at that time, we ought to take certain measures. From hindsight we should not criticize those. To tackle one problem; to be overwhelmed with that problem, we in our anxiety may create many other problems, which will ultimately be harmful to us.

I thank Advaniji, through you, Madam, for his efforts to create awareness amongst the people of this country; don’t indulge in generating black money; don’t evade taxes; don’t avoid taxes fill the Exchequer properly tap the taxes. I wish he achieve in his vision. Thank you very much. … (Interruptions)

श्री लालू प्रसाद : प्रणब जी, आप इतना बता दीजिए कि उसमें राजनेताओं के नाम हैं या नहीं? ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब आडवाणी जी बोल रहे हैं। ...( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी): अध्यक्ष महोदया...

अध्यक्ष महोदया : एक मिनट उन्हें बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : मंत्री जी, बोल रहे हैं। उन्होंने कम्पलीट नहीं किया है, वे बैठे नहीं हैं।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी): अध्यक्ष महोदया, काला धन वापस आयेगा या नहीं ...( व्यवधान) मंत्री जी के जवाब से हम संतुष्ट नहीं हैं, इसलिए समाजवादी पार्टी सदन का बहिष्कार करती है।









17.27 hrs.



Shri Mulayam Singh Yadav and some other

hon. members then left the House



…( व्यवधान)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Please understand. When we get the name…..… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : कृपया आप सब शांत हो जाइये और सुनिये।

…( व्यवधान)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Only one point I would like to suggest and that is when we get the names, we shall have to work out on them. Suppose I get hundred names, some of them may be the genuine account holders; some of them may be having export businesses; some of them may be investors in that country. A circulation was made that MPs names are there. No MPs name did I find in the documents which I have seen. But I cannot go on saying that this name is there; and this name is not there. That is not the purpose. Therefore, I shall have to ascertain; though many of them may be the genuine account holder with the permission of the Reserve Bank for their business; for their investment purposes. India is emerging as one of the largest investors in Europe. Three consecutive years, Indian investors were second in the U.K. Therefore, we shall have to keep in mind these aspects. There is a demand that we publish the names; give names; and names will get highlighted. But what will happen? It will have its impact on the industry, on the investment, and on the reputation of the people. We shall have to think of these things.





श्री लाल कृष्ण आडवाणी (गांधीनगर): अध्यक्ष महोदया, मैंने अपने भाषण में काले धन के संदर्भ में मुख्य रूप से तीन बातें कही थीं। एक यह कि सरकार का क्या अंदाजा है? कितना काला धन विदेशी बैंकों में है, क्योंकि आप भी कहते हैं कि आपको ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी ज्यादा रिलायेबल लगती है। आप कभी-कभी हमारे टास्क फोर्स को भी कोट करते थे। मैं समझता हूं कि रिजर्व बैंक का या गवर्नमेंट की फाइनेंस मिनिस्ट्री का ज्यादा अच्छा एस्टीमेट होगा हम लोगों से या इवेन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी से क्योंकि भारत के साथ सीधा संबंध तो भारत सरकार का ही हो सकता है, अन्य किसी का नहीं हो सकता है। आपने जो जवाब देना था, दिया। उसमें से मुझे उत्तर नहीं मिला। मैं चाहूंगा कि जिस समय आप अपना व्हाइट पेपर दें, उसमें भी इस बात का उल्लेख करें कि हमारा अंदाजा क्या है। आपने खासकर तीन संस्थाओं के बारे में कहा है। जिन तीन संस्थाओं से आपको जो इनपुट्स मिलेंगे, जो जानकारी मिलती है, वह व्हाइट पेपर में आ सकती है, apart from the other steps that the Government has taken in order to find out about the black money and get it back. The second question is this. मैं मानकर चलूं, आपका बीच में एक जवाब आया कि इतने हजार करोड़ रुपये फायदा हुआ है ...( व्यवधान) या अनर्थ किए हैं। ...( व्यवधान) What does it mean? आपने अनर्थ किया है, उसका मतलब है कि इनकम टैक्स के प्रोब में आपने अनर्थ किया है ...( व्यवधान) या we have been able to get this much money from outside back into the country. मुझे जो बात लगती थी कि it was not merely America or UK or Germany which have actually got back their money from Switzerland or such tax havens, but very many small countries also indicate how much money they have got back from Switzerland or from some other tax havens. मैं जानना चाहता था कि इस सारे प्रोसेस में, आपका कहना यह है कि कोई वर्ष 2003 में, जब उन्होंने कंवेन्शन अगेन्स्ट करप्शन पास किया, तब से स्थिति में बहुत परिवर्तन नहीं आया। तब से परिवर्तन आया केवल टेररिज्म के संबंध में या क्राइम के सन्दर्भ में, लेकिन मैं मानता हूं कि जिन लोगों ने विदेशों में बैंकों में पैसा रखा है, वे केवल टैक्स इवेडर्स नहीं हैं। अगर किसी ने भ्रष्टाचार से पैसा कमाया है, तो उसने भी उसके कारण विदेश में पैसा रखा है और इसीलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ जब मैंने यह देखा कि लिब्रलाइजेशन के बाद, वर्ष 1991 के बाद जितना परसेंटेज इलीसिट फ्लो फ्रॉम इंडिया टू फॉरेन बैंक्स हुआ है, that money is much more than before. मैंने स्वयं अपने भाषण में कहा कि अर्लियर मैं यह मानता था कि जितना ब्लैक मनी जेनरेट हुआ है, वह प्रमुख रूप से टैक्सेशन के हमारे हाई लेवल्स के कारण होता है, लेकिन लिब्रलाइजेशन के बाद, जब से आज के हमारे प्रधानमंत्री जी वित्त मंत्री बने थे, उसके बाद की स्थिति में यह स्थिति आई कि सभी ने, इवेन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी ने लिखा कि उसके बाद का परसेंटेज विदेशों में ब्लैक मनी जाने का बहुत हाई है। यह चिंता पैदा करता है कि ऐसा क्यों होता है, अब तो टैक्स लो हो गया है। It is perhaps the lowest among the lowest in the world. दूसरा सवाल मेरा इस संदर्भ में था और तीसरा सवाल उसी से जुड़ा हुआ है कि टैक्स इवेज़न के आधार पर या किसी भी आधार पर किसी ने अगर बिना परमीशन के, आपने जो बात कही है, वह मैं हमेशा कहता हूं कि अगर किसी का लेजिटिमेट फॉरेन एकाउण्ट है that cannot be regarded as a crime, as an offence. I have always said that those who have legitimately have foreign bank accounts with the permission of the Government of India or the Finance Ministry, I have nothing to say about that. But there would be some who had totally unaccounted money and without any permission, on those cases I would like to know as to whether any case has been penalised for that and whether anybody has been identified and punished for that.

आपकी रिप्लाई में इन तीनों सवालों का उत्तर नहीं मिला, इसके कारण मैं असंतुष्ट हूं। बाकी तो मैं इस बात से सहमत हूं।...( व्यवधान)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Madam Speaker, if he yields for a minute, I would like to share some information. He mentioned about Rs. 66,000 crore. That is the prevention of the profit going outside. It is not that we have got Rs.66,000 crore as the tax. Through the application of transfer pricing mechanism, our officers prevented the transfer of the profit of this amount outside. This is one.

Second, through international tax operation in the last two years, the tax which we have collected is Rs.33,784 crore. In addition to that, Investigating Wing of the CBDT domestically have unearthed Rs.18,750 crore concealed income and in the current year Rs.3,887 crore concealed income up to now. What will be the tax will be available to them.

Now, from the foreign sources information which we have given, the scrutiny and other things take some time, but in 98 cases the Department has detected undisclosed amount of Rs.533 crore and we have already realised Rs.166 crore in taxes; the balance are still in the process. This is about the tax realisation and this information I wanted to share with you.

श्री लाल कृष्ण आडवाणी :मेरी जानकारी में, जैसा मैंने कहा कि केवल बड़े देशों ने धन प्राप्त किया है, उन्होंने तो बड़े अमाउंट्स प्राप्त किए हैं इस टैक्स हेवन से, लेकिन पेरू जैसे देश ने 77 मिलियन यूएस डालर्स, मोरक्को केस में भी हें, फिलिपींस का मैंने उल्लेख किया 683 मिलियन यूएस डालर्स, नाइजीरिया केस में 458 मिलियन यूएस डालर्स, मैक्सिको केस में 74 मिलियन यूएस डालर्स, ऐसा करके छोटे-छोटे देशों ने भी इतने प्राप्त किए हैं।

I do not think that India can be disregarded in this matter. India is in a position today that after this Convention Against Corruption, at least cases where it is a case of not just tax evasion which is not an offence in that country, but there is a case of corruption. जैसे मैं समझ नहीं पाया कि इस हसन अली का क्या प्रभाव है कि हम उसके बारे में कुछ नहीं कर पा रहे। उन्होंने इतना सारा अमाउंट वहां पर रखा। What is really the source of his strength? मैं चाहूंगा कि हसन अली के बारे में विस्तार से जवाब दें।

संसदीय कार्य मंत्री तथा जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल): यह हसन अली वाला मामला कोर्ट में है, क्या आप कोर्ट को डायरेक्ट करेंगे?

श्री लालकृष्ण आडवाणी : मैं कोर्ट को डायरेक्ट नहीं करूंगा। जितनी मुझे जानकारी है, वह मैं दे सकता हूं। वह सही है या गलत, आप उत्तर दे सकते हैं। It is a case which has been discussed in the media, on the Television, at length and therefore, it is a very mysterious case which I am not able to understand, particularly, when it was questioned: “कहते हैं कि सारा पैसा हवाला का है, जितना पैसा उसने वहां रखवाया।” आपने एक बात स्पष्ट की कि 2012 कहां से आ गया, यह मैं नहीं जानता हूं, लेकिन आपका कहना यह है कि यह तारीख उन्होंने इंसिस्ट किया कि यह प्रोसपेक्टिव होगा।

SHRI PRANAB MUKHERJEE: It was 1st April 2011. That is in relation to the date of 1-4-2011 because the agreement was signed in August 2010. They said it would take some time for us to ratify this agreement. I am talking of India-Swiss Agreement. Therefore, the date which was mentioned there is 1-4-2011.

SHRI L.K. ADVANI : Maybe, but this will only indicate that those who had without permission opened unauthorized accounts in Swiss banks earlier, we will not be able to do anything about them. I do not know how the other countries have managed it … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Let us have order in the House, please.

SHRI L.K. ADVANI : But it is something that, on the face of it, it would seem to me that we have voluntarily given up our right to enquire about black money abroad.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: That was on 3rd November. We are insisting – and I am confident that we will succeed – that you have to give us these information. If you just take your seat, I will complete in two minutes.

One information that I want to have from them is about the past. When I find that this information is available, if we get it about the past, we will give you. You give us the past information; that is one. Second information we are insisting on is that you have to cooperate with us to get and realise the money from the assets located in our country. We can realise the money – once it is established – from the assets located in our country. There is no problem. But the assets located in those countries where the tax-evader has deposited his money, to recover from those assets, we require their cooperation. We are insisting on it. What the Prime Minister impressed on the G 20 countries in the Summit is that, at least, if these 20 countries and if we voluntarily agree to make these commitments, then all others will follow, and that accounts for 85 per cent of the world economy. Therefore, in no way we are lagging behind. We are working. But, at the same time, as I will quote the official spokesperson of OECD, we shall have to be a little patient. So far as Switzerland is concerned, as I mentioned, for all countries the same provisions they have for providing information from “prospective” and from “retrospective” date.

SHRI L.K. ADVANI : You referred also to the LTG Bank and spoke to me about why I should quote from the order. It was an order; it was not a final judgement. But I know that between the two judges, there is a difference and the matter is being referred to a third judge. But this order has not been stayed from which I said. Had it been stayed, I would not have quoted it. It is an order. … (Interruptions) You mentioned it in a manner as if I have done something wrong by quoting it.… (Interruptions).

MR. CHAIRMAN: Address the Chair, please.

… (Interruptions)

SHRI L.K. ADVANI : I knew that it had not been stayed; therefore I quoted it. So far as the order is concerned, the final operative part was quoted by your colleague, Manish also, and I accept it; I knew about it. … (Interruptions)

श्री लालू प्रसाद : मैडम, प्रणब बाबू को मैं धन्यवाद देता हूं कि जो लोग सड़कों पर फालतू बातें करते थे, आदरणीय मैम्बरों के खिलाफ काले धन के मामलों की मांग करते थे, आपने संसद में क्लीयर कर दिया कि किसी भी एमपी का वहां पैसा नहीं है। मैं प्रणब बाबू को धन्यवाद देता हूं।



MADAM SPEAKER: The question is:

“That the House do now adjourn.”



The motion was negatived.

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